पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४६७

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बुलबुल ४६१ योगी सिर और मांसपेशी अत्यन्त सबल हैं; अन्य अवस्थामें ही ला कर पालना चाहिये। इस समय गायक पक्षियोंको मांसपेशी उतनी परिपुष्ट नहीं होती। लानेसे ये पालनेवालेके अत्यन्त वशीभूत हो जाते हैं तथा यही कारण है, कि इसका स्वर इतना बुलंद है तथा यह प्रौढ़ अवस्थामें निर्भय चित्तसे गाने लगते हैं। ये पोषक- बहुत समय तक नाना स्वरमें गाना गा सक्ती है। . के इतने वशीभूत प्रिय और भक्त होते हैं, कि कभी कभी बुलबुल दो तरहको देखी जाती हैं। उनमेंसे एक पोषकके विरहमें अपना जीवन पर्यन्त विसर्जन कर देते श्रेणीके पक्षी समतल भूमिके जङ्गल में रहते हैं। इनका है। इनमेंसे अधिकांश कीट और पतङ्गमोजी तथा शरीर पांच इञ्च लम्बा, पूछ ढाई इञ्च और चोंच एक इञ्चसे वन्य फलादि भी ग्वान हैं। कुछ कम होती है । चोंचका अप्रभाग सूक्ष्म और मीधा यूगेपके किमी किमी प्रदेशमें कुल बुलको पकड़नका होता है । चौत्र और मुखका भीतरी भाग पीला होता है। विशेष नियम है। यदि कोई प्रौढ़ावस्थाम' पक्षीको इनकी पीठ आदिके ऊपरी भागका रङ्ग प्रायः नम्यके पकड़े तो उसको राजदग्वाम्म दउ दिया जाता है। समान, तलभाग कुछ सफेद और दोनों पैर कुछ ललाई वहां बुलवुलके बच्चोंको पकड़ कर बेचना ही माधारण लिये हुये सफेद होते हैं। दूसरी श्रेणीके पक्षी पर्वतों नियम है। पर रहते हैं। कभी कभी पर्वतके निम्नभागमें स्थित पालतू पक्षी पिजगेंमें हो रहता है। ऐसी अवस्थामें अरण्य आदि स्थानोंमें भी देखे जाते हैं । पर्वतमें नहीं कोई जोडा जोड़ा तथा कोई एक एक पक्षीको एक एक रहनेवाले पक्षियोंकी अपेक्षा इस श्रेणीके पक्षियोंकी देहका पिंजरेमें रखते हैं। पिंजग लंबाईमें १२ इञ्च तथा परिमाण प्रायः दो इंच अधिक तथा कान भी कुछ बड़े ऊंचाईमें १ फुट होता है। वेटिन । II II ) होते हैं। प्रथम श्रेणीके पक्षीकी अपेक्षा द्वितीय श्रेणीके माहवका करना है. कि पिंजरेको हरे रङ्गने गंगाना और पक्षियोंको कंउध्वनि बहुत ऊची होती है। विशेषतः ऊपरसे हरे कपड़े द्वारा उसे ढंक देना उसित है। यदि द्वितीय श्रेणीकी बुलबुल ही रजनी-गायक कहलाती कोई उनके कहे अनुसार बुलबुल के पिंजरेको हरे रङ्गमें है। बुलबुल प्रौढ़ावस्थामे ही अधिक गाती है। गंगे, तो उनको चाहिये कि पक्षीको पिंजड़े में रखनेसे ___ इस पक्षोका नर ही अधिक गाता है। ये सब बाल्य पर्ण ले उसको अन्छी तरह शुष्क और दुर्गन्धि अवस्थामें ही प्रायः दो तीन मास तक गाते हैं तथा रहित कर ले । उन्हें पिंजरे में तीन खन तैयार दल बांध कर तीन चार मास एक स्थानमें रहते हैं। इस करना चाहिये उनमें दो पिंजरेके तलके निकट समयमें वे दो वार अण्डप्रसव, शावकोत्पादन और उनका और तीसरा उससे कुछ ऊपर रहे। पक्षियोंके कोमल पालन करते हैं । शावक अवस्थामें ही नर मादाका पैर निरापद रखने के लिये तीनों खनको हरिद्वर्णके भेद अच्छी तरह मालूम पड़ता है। जिन बच्चोंके वक्ष कपड़े ( मखमल आदि ।-से मंचित कर देना चाहिये । और पंखका अप्रभाग कुछ पीला और गला सफेद होता पिजड़े में एक जलपात्र इस तरह रखना चाहिये, कि पक्षी है, बे मर और जिनका गला सफेद, पंखका अग्रभाग इच्छानुसार उससे उतर कर पात्रमें स्नान कर सके । बिलकुल पोला नहीं होता वे मादा समझे जाते हैं। पिजड़े के नात्रेका भाग एकदम पानोसे न भीग जावे यह पक्षी सममण्डलवासी है। यूरोप और एशिया इसलिये उसकी तह पर एक ब्लोटिङ्ग पेपर या आयल बहुतसे प्रदेशोंमें तथा अफ्रिकाके केवल नील.. क्लोथ विछा देना चाहिये । उसे फिर परियर्सन कर नदके तोरवतों देशमें यह पक्षी मिलता है। मादा एक पिजड़े की बोटको बाहर निकाल देना उचित है। बारमें ५ या ६ हरे कपासी रंगके छोटे छोटे अंडे देती परीक्षाके द्वारा जाना गया है, कि जो बुलबुल पक्षी हैं। पंद्रह दिन अंडे सेनेके वाद वच्च शहर निकल यत्न पूर्वक साफ पिजड़ में रस्त्रे जाते हैं वे अच्छा आते हैं। इनका घोंसला जमीनसे कुछ ऊपर तथा मधुर गान गाते हैं। निर्जन वा विरक्तिजनक स्थान इन- लम्ब तिनकोंसे ढकी मिट्टीमें रहता है। इनको शावक को बिलकुल पंसद नहीं है। ऐसे स्थान में रखनेसे उतने Vol. xv. 116