पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४७१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


बंदा-बंदी ४६५ बूदा (हि.पु०) १ बड़ी टिकुली । २ सुराहीदार मणि या ! योगसे चाहमानजीका चन्द्रलोकसे आना लिखा है उससे मोती जो कान या नथमें पहना जाता है। चन्द्रवंशी होना इस लिये नहीं माना जा सकता, कि बूंदाबांदी (हिं स्त्री०) अल्प वृष्टि, हलकी या थोड़ी उस लेखसे पहले संवत् १२००के ओरपासके शिलालेखोंमें वर्षा। कई जगह इनको सूर्यवंशी लिखा मिलता है । १३वों बूंदी-दक्षिण पूर्वी राजपूतानेका एक स्वतन्त्र राज्य । यह शताब्दीके आरम्भके लिखे 'पृथ्वोराज विजय' काध्यमें अक्षा० २५ से २६ उ० तथा देशा० ७५१५ से ७६१६ पू- जगह जगह चौहानोंको सूर्यवंशी लिखा है। उसमें लिखा है, के मध्य विस्तृत है । इस राज्य के उत्तरमें जयपुर और टोंक- कि ब्रह्माजीको प्रार्थनासे वि'णुने सूर्यको ओर देखा तो का राज्य, पश्चिममें उदयपुर अर्थात् मेवाडका राज्य, सूर्यमण्डलसे एक पुरुप आया, वही चौहान ( चाहमान ) दक्षिणमें कोटा और मेवाडका राज्य और पूर्व में कोटा कहलाया, पर वहां ही उसके भाई धनंजयका भी वर्णन राज्य है। भूपरिमाण २२२० मीलसे कुछ अधिक है। है जिसकी उत्पत्तिका कुछ भी पता नहीं, कि वह कहांसे जनसंख्या दो लाखके लगभग और आय १२ लाखके आ गया। परन्तु दूसरे स्थल पर इनको ( चाहमान )- अन्दाज है। इस राज्यमें माहेश्वरके पुराण प्रसिद्ध राजा राम इक्ष्वाकु और रघुके वंशमें लिखा है (१)। हमीर रन्तदेव(१)का बसाया हुआ चंबल नदीके तट पर पाटन महाकाव्यमें लिखा है, कि पुष्करमें ब्रह्माजीके यज्ञको रक्षा- नगर एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहां पर केशवराय के लिये ब्रह्माके ध्यानसे सूर्यमण्डलसे एक दिव्य जीका प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है जिसका जीर्णोद्धार संवत् पुरुष उतर कर आया और उसने यक्षकी रक्षा कर १६९८ वि०में वू'दीके इतिहासप्रसिद्ध वीर नरेशराव ब्रह्माजीको संतुष्ट किया, उसी पुरुषका नाम चाह- राजा छत्रसालजीने कराया था। कार्तिक सुदि १३से मान हुआ । पृथ्वीराजरासौ नामक महाकाव्य मंगशिर बदि दोज तक ५ दिन यहां बड़ा मेला जुड़ता है। में वशिष्टजीके यज्ञकी रक्षाके लिये आबू पर्वत पर दूसरा तीर्थस्थान बूदीसे डेढ़ कोस पर बानगङ्गाके ४ क्षत्रियोंको अग्निकुण्डसे उत्पसि लिखी है। उसीमें किनारे केदारनाथ है। चाहमान ( चतुर्भुज ) जं की उत्पत्तिका भी वर्णन है। बू'दीके नरेश हाड़ा चौहान हैं जो साम्हरके चौहान और भो कई अन्यों में सूर्य और अग्नि वंशी लिखा है। राजाः माणिकराज ( संवत् ७४२ ) को संतानमें अस्थि- सूर्यांश वर्णन करनेवालोंमें ब्रहाजीके यज्ञकी रक्षाके पालजीके वंशज होनेसे हाड़ा संज्ञाको प्राप्त हुए हैं। लिये चाहमानजीका सूर्यमण्डलसे आना लिखा है और क्योंकि हाड़ा वंश चौहानवंशकी एक शाखा है। इस- अग्निवंश वर्णन करनेमें ब्रह्माके पुत्र वशिटके यज्ञकी रक्षा- लिये पहले चौहान वंशके विषयमें परिचय ठेना बहुत के लिगे यज्ञकुण्डसे उत्पन्न होनेका विधान है। भेद आवश्यक है। टाड साहबने चौहानवंशकी अग्निकुण्डसे कुछ नहीं है, यज्ञकी रक्षा और विष्णुका संबन्ध दोनोंमें है उत्पत्ति लिख कर भी इनका सामवेद सोमवंश माधुनी और दोनोंके यज्ञमें देवताओंका आह्वान होना भी शाखा और बाचा गोत्र लिखा है जो बिलकुल एक दूसरेके स्वाभाविक बात है । मू का नाम भी विष्णु है । अग्निको बिरुद्ध है। सामवेदकी कौथुनी शाखा है माधुनी शाखा मृत्यु लोकमें अग्नि, अंतरिक्षम विद्युत और धुलोक- नहीं है माद्यहिन्दिनी शाला तो यजुर्वेदकी है। और अग्नि- में सूर्य कहते हैं। अतः सूर्यका नाम भी अग्नि सिद्ध है तब कुण्डसे उत्पन्न होनेके कारण सोमवंश भी नहीं हो। चौहानोंका सूर्यवंशी या अग्निवंशी होनेका भेद कुछ नहीं सकता, अग्निवंश कहला सकता है। केवल संवत् १३७७ है। आज कल चौहान अपनेको अग्निवंशी हो मानते हैं। के रावलु भाके शिलालेखमें बत्सके ध्यान और चन्द्रके (२) नगदा मथुरा रेलवेके सवाई माधोपुर स्टेशनसे ६ कोस : (१) “काकुत्स्थमिक्ष्वाकु रधू च यवत्पुराभव वि प्रबरं रधोकुलम् पर रणथेभोरका प्रसिद्ध प्राचीन किल्ला है जो संभव है इसी रन्त कलावपि प्राप्य स चाहमानता प्ररुद नुर्य प्रवरं बभूव तत् ॥" देवका बनवाया हुआ हो। (पृथ्वीराज विजयाद्व० सर्ग ७..) Vol. xv. 117