पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४७७

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बूट (अ.पु०) एक प्रकारका अंगरेजी ढगका जूता जिस- होती है, एक सफेद और दूसरी लाल । इसे सुखा कर से पैरके गट्टे तक ढक जाते हैं। १०.१५ वर्षों तक रख सकते हैं। खूटा (हिं. पु० ) १ छोटा वृक्ष, पौधा ।२ पश्चिमी हिमा- बूरा (हि.पु.) १ कश्यो चीनी जो भूरे रंगकी होती है, लयमें गढवालसे अफगानिस्तान तक होनेवाला एक छोटा शक्कर । २ साफ की हुई चीनी । ३ महीन चूर्ण, सफूफ । पौधा। ३ फूलों या वृक्षों आदिके आकारके चिह्न जो वूगे ( हि स्त्री० ) एक प्रकारकी बहुत छीटी वनस्पति । कपड़ों या दीवारों पर अनेक प्रकारसे बनाए जाते हैं। यह पौधों, उनके तनों, फूलों और पत्तों आदि पर उत्पन्न बटी (हिं० स्त्री० ) १ वनस्पती, जड़ी। २ भांग, भंग। हो जाती है। इससे वे पदार्थ सड़ने या नष्ट होने लगते ३ एक पौधा जिसके रेशेसे रस्सियां बनाई जाती हैं। हैं। अंगुरके लिये यह विशेष प्रकारसे घातक होती इसे गुलबादला भी कहते हैं। ४ खेलनेके ताशके पत्तों है। इसकी गणना वृक्षों आदिके रंगोंमें की गई हैं। पर बनी हुई टिक्की। ५ फूलोंके छोटे चिह्न जो कपड़ों बला (हि. पु० ) पयालका बना हुआ जूता, लतड़ो। आदि पर बनाये जाते है। वृहण ( स० वि० ) वृहिल्यु। पुष्टिकारक । बड़ना (हिं० क्रि०) १ निमजित होना, डूबना। २ निमग्न बृहणत्य ( स० क्ली० ) वृहरस्य भावः त्व। ब्रहणका होना, लीन होना। | भाव या धर्म। बूड़ा (हिं० पु० ) वर्षा आदिके कारण होनेवाली जल की बाहित ( स० क्लो०) वृह-क्त । हस्तिगर्जन, चिंघाड़ वाढ़। मारना। बढ़ ( हिं० पु० ) १ लाल रंग। २ बीर बहुटी । वहिता (स० स्त्री०) स्कन्दमातृकाभेद । कहीं कहीं बढ़ा (हिं० पु०) बुड्ढा देखो। बाहिला' ऐसा भी पाठ देखा जाता है। बत (हिं० पु०) बूता देखो। बृटिश (हिं० वि० ) ब्रिटिश देखो । बता (हिं० पु०) पराक्रम, बल । बृवदुक्थ (सं० क्ली०) पद । ब थमी ( हिं० स्त्री० ) आकृति, चेहरा, शकल। बु (स पु०) १ पणिका तक्षा । २ वेदोक्त एक पणिराज । बूना (हिं० पु०) चनार नामक वृक्ष । चनार देखो। बूक ( स० क्ली० ) जल, पानी। बम ( अं० पु.) १ वह लट्टा जो नदी आदिमें नावोंको वृष (स० पु० ) वृष देखो । छिछले पानीसे बचाने और ठोक मार्ग दिखलानेके लिये बृसय ( स०.पु० ) १ असुर । २ त्वष्टा । “अवातिरतं वृस- गाड़ा जाता है। २ जहाजोंके पालके नोचेके भागमें यस्य” (मृक १६३।४) ३ एक असुर रोग । (वेद०) लगा हुआ लट्ठा। यह उसे फैलाए रखनेके लिये लगाया वृसी ( स० स्त्री० ऋषियोंका आसन । जाता है। ३ वह रोक जो बहुतसे लट्ठों आदिको बांध वृहक (सं० पु० ) वृह-क्कन । देवगन्धर्वभेद । कर तैयार की जाती है। यह नदीमें इसलिये लगाई बृहश्चञ्चु ( स०पु० ) वृहती-चञ्चुः शाकविशेषः । १ महा- जाती है जिससे बहती हुई लकड़ियां इसमें रुक जांय । चञ्चुशाक । (त्रि०)२ दीर्घचञ्चुयुक्त, लम्बी चोंचवाला। ४ लट्ठों या तारों आदिसे बनाई हुई वह रोक जो बन्दरों- वृहञ्चित्त ( स० पु०) फलपूर, बिजौरा । में शतके जहाज अंदर आनेसे रोकनेके लिये लगाई बृहच्छन्दस् ( स० वि०) बृहच्छादयुक्त। जाती है। बृहच्छरीर ( स० वि०) बृहदाकारविशिष्ट । बूर (हि.पु०) एक प्रकारकी घास जो पश्चिम भारतमें यहच्छल्क (संपु०) गृहन् शल्को यस्य । चिङ्गटमत्स्य । होती है। इसके खानेसे गौओं भैसों आदिका दूध और बृहच्छाल ( स० वि० ) वृहत् शालयुक्त। दूसरे पशुओंका बल बहुत बढ़ जाता है। इसमें एक प्रकार- | बृहच्छबस् (सं० वि० ) वृहत् स्रवौ यस्य । महायशस्क । की गंध होती है। यदि गौए आदि इसे अधिक खायं, तो वृहजाबालोपनिषद् (स' स्त्री०) उपनिषद्भेद । दूधमें भी वही गंध आ जाती है । यह घास दो प्रकारकी | बृहजाल (स० क्लो०) बड़ा जाल ।