पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४८५

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वृहस्पतिचार-च ७६ होनेसे मूल और फलक्षय तथा हृदयनक्षत्र पापग्रह द्वारा बहत्संहिता ८ अ० आदि प्रन्यों में विशेष विवरण लिखा पीड़ित होनेसे शल्य-नाश होता है। है। षष्ठिसंवत्सर देखो। शकादित्य राजाके समयसे ले कर जितने वर्ष बोते बहस्पतिदत्त ( स० पु०) पाणिनिका बात्तिकोक्त नाम- हैं, उनको दो जगह रख कर एक जगहके अङ्कको ११. भेद । से गुणा करो। उस गुणफलको फिर ४से गुणा करो। बहस्पतिपुरोहित ( स पु० ) वृहस्पतिः पुरोहितो यस्य । बादमें उक्त गुणफलके साथ ८५८६ जोड़ो और फिर इन्द्र। २ देवमात्र । उस योगफलको ३१५०से भाग करो । पश्चात् अन्य बहस्पतिप्रसूत( स० वि० ) वहस्पति देव कर्तृ! अनु। स्थानस्थ शक वर्ष के अङ्कके साथ उस भागफलको जोड़ो। ज्ञात । उस योगफलको ६०से भाग कर बोकीको ५से भाग करने वातिमन (मंत्रि.) बहम्पतियुक्त। पर जो लब्ध होगा, उस लब्धाङ्क संख्याके नारायण आदि बृहस्पतिमिश्र । म पु० ) रघुवंशके एक टोकाकार । युग और भवशिष्ट अङ्क द्वारा उस युगवत्ती इतने संख्यक वर्ष चल रहा है, यह मालूम हो जायगा। उक्त वर्ष वहम्पतिघार ( स० पु०) वारभेद, रवि प्रभृति बारोमैसे संख्या जितनी होगी, उमको हमे गुणा करो। बाद एश्चम वार, यह बार शभवार है अर्थात् इस बारमें सब फिर उसी वर्ष संख्याको १२मे भाग दो। भागफलको प्रकार के शभकर्म किये जा सकते हैं। इस वाग्में माधा- ग्णतः क्षोतम निषिद्ध । वहस्पतिवारमें जन्म लेनेसे उस नवगुणित अङ्कमें जोड़ कर हमे भाग देने पर जो लब्ध होगा, उम संख्यक नक्षत्र में वृहस्पति विद्यमान हैं, जात बालक शास्त्रवत्ता, सुन्दरवाक्यविशिष्ट, शान्तप्रकृति- युक्त, अतिगय कामी, बहुपोषणकर, स्थिरबुद्धि और ऐसा समझना चाहिए : परन्त गणनाके समय २४ नक्षत्र. कृपालु होता है। बार देखो। गणना करना चाहिये। इसमें १ लब्ध होने समझना चाहिये, कि २५ नक्षत्र पूर्वभाद्रपदनक्षत्र है। २ रहनेसे बहस्पनिसव (म पु०) यन्नभेद । आश्वलायन श्रौत २६ उत्तरभाद्रपद इत्यादि। इमो प्रकार मभी नक्षत्र सूत्रमें इम यक्षका विवरण लिम्रा है : क्षत्रियोंके जैसा राज- जाने जा सकते हैं। सूययश है, नैमा हो ब्राह्मणोंके लिये यह गृहम्पनिसव है। इन द्वादश युगोंके यथाक्रमसे अधिपति विण. सरेय बृहस्पतिस्तोम (स पु० ) एकाहयोगभेद । वलभि', अग्नि, त्वष्टा, उत्तरप्रोष्टपद, पिनगण, विश्व ब हम्पतिस्मृति (सं० स्रो०) अङ्गिाके पुत्र व हम्पति ऋषि सोम, शत्र, अनिल, अश्वि और भग हैं। इन यगाधि कृत एक स्मृति। पतियोंके नामानुसार हो युगोंके नाम हुए । इन ग्रेग ( हिं० पु०.) मेंढक । भेक देखो। युगोंके अन्तर्वती पांच पांच वर्ष में फिर पांच पांच संज्ञा बेंगल ( हिं० : ० ) यह बीज जो ग्वेतिहगेको उधार दिया होतो है। जैसे-संवत्ला, परिवत्सर, इदावत्सर, अनु. जाता है और जिसके बदले में फसल होने पर तौलमें वत्सर और इद्वत्सर। इनके अधिपति क्रमशः अग्नि, उससे कुछ अधिक अन्न मिलता है। इसे वेग या बीट भी सूर्य, चन्द्र, प्रजापति और महादेव हैं। इन पांच वर्षों कहते हैं। से प्रथम वर्षे सुवृष्टि, द्वितीय वर्षके प्रारम्भमें वृष्टि, बेंगनकुटी ( हिं० स्त्री० ) भवाली नामका पक्षी। तृतीय वर्ष में प्रचुर वृष्टि, चतुर्थके शेषमें वृष्टि और पञ्चम भवाली देखो। वर्ष में सामान्य व.ष्टि होती है। बेंच ( अं० स्त्री० १ लकड़ो, लोहे या पत्थर आदिको . वृहस्पतिके सञ्चार', उदय, अस्त, महोस्त, प्रशस्त आदि बनी हुई एक प्रकारकी चौकी । यह चौड़ी कम और लंबी द्वारा तथा प्रभादि षष्ठि संवत्सर द्वारा वर्षका शुभाशुभ अधिक होती है। इस पर बराबर बराबर कई आदमी एक मालूम होता है। लेख बढ जानेके भयसे यहां ज्यादा साथ बैठ सकते हैं। कभी कभी इसमें पीछेकी ओरसे नहीं लिखा जा सका । मलमासतत्त्व, ज्योतितत्व, ऐसा जोड़ भी लगा दिया जाता है जिससे बैठनेबालेकी