पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/४८४

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वृहस्पातक - वृहस्पतिचार बृहस्पति जन्मराशिस्थ होनेसे भय, द्वितीयमें होनेसे के साथ भी शत्रुता हो जाती है। पौष नामक वर्षमें अर्थलाभ, तृतीयमें शारीरिक क्लेश, चतुर्थ में अर्थनाश, जगतका शुभ होता है। राजा लोग आपसको शत्रुता पश्चममें शुभ, षष्टमें अशुभ, सप्तममें राजपूजा, अष्टममें छोड़ देते हैं। माघ नामक वर्षमें पितृगणको पूजावृद्धि, धन नाश, नवममें धनवृद्धि, दशममें प्रणय भङ्ग, एकादशमें सर्व प्राणियोंकी आरोग्यता और धान्यकी सुलभता होती लाभ और द्वादशमे होनेसे शारीरिक एवं मानसिक पीड़ा है। फाल्गुन-वर्षमें कहीं शुभ और शस्यवृद्धि, स्त्रियोंका होती है। - दौर्भाग्य, तस्करोंकी प्रवलता और राजाओंको उग्रता गोचरम वा जन्मकालोन बहस्पति विरुद्ध होनेमे उस प्रकट होती है। चैल-वर्ष में सामान्य वृधि, शस्य-पृद्धि की शान्ति करना, अर्थात् जप, होम, दानादि करना राजाओंमें मृदुता और रूपवान् व्यक्तियोंको पीड़ा होती विधेय है। वहस्पतिका दान --चीनो, दारुहरिद्रा, अश्व, । है । वैशाख वर्ष में राजा प्रजा दोनोंमें धर्म-तत्परता, भय- (अभावमें २५ 'कापयिन्' कौडी), पीतधान्य, पीतवस्त्र, रक्त- शन्यता और आह्वाद होता है। ज्येष्ठ संवत्सरमें राजा- पुष्प, लवण और स्वर्ण ये वस्तुएं बस्त्र और दक्षिणाके गण धर्मपरायण होते हैं। कंगु और शमोजातिके सिवा साथ उत्सर्ग करके प्रहविप्रको दान देना चाहिये। अन्य सभी प्रक रके धान्य पीड़ित होते हैं। आषाढ़-वषमें ब्राह्मण इस दानको ग्रहण करनेसे वे नरकके पात्र होंगे। ; शस्य वृद्धि और जगह जगह अनावृष्टि और राजागण मवाहस्रोलमें कहा हुआ वहस्पतिका स्तोत्र अत्यन्त व्यग्र होते हैं। श्रावण संवत्सरमें शस्य-वृद्धि "देवतानामृषीयाञ्चगुरु कनकसनिभम् । और दुष्ट लोगोंको पीड़ा होती है। भाद्रपद वर्षमें कहीं बन्यभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ॥" : सुभिक्ष और कहों दुर्भिक्ष होता है। आश्विन संवत्सर- वहस्पतिक ( स० पु०) १ वहस्पति भव । २ वहस्पति-! में अत्यन्त जल-पात, शस्य-वृद्धि और प्रजाओंमें सुख

स्वाच्छन्ध होता है।

बहस्पतिचक्र ( स० क्ली० ) बहस्पतेश्चक्र । चक्रविशेष । बहस्पति जब नक्षत्रोंके उत्तरमें विचरण करते हैं, ब,हस्पतिके मञ्चारकालोन अश्विनी प्रभृति सत्ताईस नक्षत्र- तव सभीके लिये आरोग्यता लाभ, सुवृष्टि भौर मंगल गुक्त नराकार चक्र। इस चक्र द्वारा बृहस्पति के सञ्चार- ' होता है। दक्षिण में अवस्थित होनेसे उक्त फलके विप- में शुभ होगा वा अशुभ, यह जाना जाता है। रोत फल होता है। बहस्पतिके एक वर्षमें दो नक्षत्रों में बहस्पतिचार (सं० पु०) बहस्पतेश्चारः सञ्चारः । बह- विचरण करनेसे शुभ, ढाई नक्षलोंमें मध्यम फल तथा स्पतिप्रहका सञ्चार। बहत्संहितामें लिखा है,---बह-! इससे अधिक नक्षत्रों में विचरण करनेसे अशुभ फल स्पति जिस मास वा जिस नक्षत्रमें उदित होते होता है। हैं, उस नक्षलके अनुसार मासका नाम होना : बृहस्पतिका वर्ण अग्निके समान होनेसे अग्निभय, है। १२ मास हैं इसलिए १२ वर्ष होंगे। कृत्तिकासे . पीत होनेसे व्याधि, श्याम होनेसे योद्धागम, हरा होनेसे लेकर दो दो मझलोंमें कार्तिकादि वर्ष होंगे, किन्तु उन · चौर-भय, लाल होनेसे शस्त्र-भय और धूमाभ होनेसे अना- द्वादश वर्षों में पञ्चम, एकादश और द्वादश वर्ष दो दो वृष्टि होती है। बहस्पति दिनको दिखाई देनेसे बहुत ही मालों में होंगे । जैसे, कृत्तिका वा रोहिणी नक्षत्रों में बह- अमङ्गल और रात्रिको दोखनेसे शुभ होता है। कृत्तिका स्पतिका उदय होनेसे कार्तिक नामक वर्ष होता है। इस . और रोहिणी नक्षत्र वर्षकी देह हैं, पूर्वाषाढ़ा नक्षल उनको वर्षमें शकटाजीवी और अभ्याजीवो लोगोंको तथा गो- , नाभि हैं, अश्लेषा हृदय है और मघा नक्षत्र वषका कुसुम जातिको पीडा, साधि और शस्त्रका प्रकोप होता है ; है। ये नक्षत्र शुभ होनेसे शुभ फल होता है। बहरूपति- रक्त पीतवणे पुष्पोंकी वृद्धि होती है। सौम्यवर्षमें अना के रहते हुए वर्षका देह नक्षत्र यदि पापग्रह द्वारा पीड़ित वृष्टि, चूहे दिली आदि जन्तुओं द्वारा शस्यको हानि होतो हो, तो अग्नि और वायुजनित भय होता है, नाभि नक्षत है। मानवोंको व्याधि-भय, शसका प्रकोप तथा मित्रों- पीड़ित होनेसे क्षुधा-जन्य भय, पुष्पनक्षलके पोड़ित