पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५४८

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बौद्धधर्म परिवाद और निःसारण प्रभृति दण्डके बाद जब उनके स्मरणार्थ केशगुच्छ दिया था । यही सोंके लिए मिक्षुओंको पुनः सङ्घमें लिया जाता था, तब भिक्षु गण प्राचीनतम पवित्रस्मृति है। कोई कोई कहते हैं, कि उन एकत्र हो कर निर्धारण करते थे, कि अपराधीको शास्ति। दोनों वणिकोंने नख और केशक सिवा उनके पात्र और हुई है या नहीं। इस समय २० या इससे अधिक तीन परिच्छद भी पाये थे। भिक्ष ओंका समावेश होना आवश्यक था। ब्रह्मदण्ड सिंहलमें भी ऐसी ही केशस्मृतिका विषय प्रचलित नामक एक प्रकारकी अद्भुत शास्तिका उल्लेख देखनेमें है। कन्नौज, अयोध्या, मथुरा आदि आर्यावर्त्तके अनेक आता है। परिनिर्वाण प्राप्तिके कुछ दिन पहले वुद्धदेवने स्थानों में बुद्धदेवको केश और नखरूप पवित्र स्मृति चण्ड नामक एक व्यक्तिको यह शास्ति प्रदान करनेके संरक्षित है और वहां स्तूप बनाया गया है । कन्नौजके इस लिए अपने प्रिय शिष्य आनन्दको आदेश दिया था। स्तूप और पवित्र स्मृतिके सम्बन्धमें बौद्धसमाजमें अनेक आनन्द उस समय जानते नहीं थे, कि ब्रह्मदण्ड किसे कहते अलौकिक कथाएं प्रचलित थीं। सत्कारके बाद है। पूछने पर बुद्धदेवने कहा था, "चण्डकी जो खुशी शरीरका जो अंश बच जाता है, वही सर्वप्रधान शारी- हो सो बोले, किन्तु भिक्षु ओंमेंसे न तो कोई उसके साथ रिक स्मृति है। बुद्धदेवकी मृत्युके बाद उनके शरीर बातचीत करे और न कोई उसे उपदेश दे या कुछ पूछे।” की अवशेष-स्मृति ले कर राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, इसी शास्तिसे चण्डके भारी अनुताप हुआ था और अल्लकल्प, रामग्राम, बेहाद्वोप, पावा और कुशीनगर इन इसोसे यह शास्ति प्रचलित हुई। आठ स्थानों में आठ स्तप बनाए गए। उक्त आठ स्तपः अपराध स्वीकार करना अन्यतम शास्ति है । पहले नियम के सिवा बुद्धदेवके स्मरणार्थ द्रोण और मौर्यवंशियोंने था, कि जब भिक्ष गण प्रति पक्षमें एकत्र होते थे, तब भी दो मूर्तिकी प्रतिष्ठा की थी। प्रवाद है, कि बुद्धदेव. यह स्वीकारोक्ति करनी पड़ती थी। किन्तु उसमें विलम्ब : का एक दाँत स्वर्गमें, एक गान्धारमें, एक कलिङ्गमें और होता था और कार्य में हानि पहुंचती थी ; इसलिए अन्त एक नागलोकमें पूजित होता है। में यह नियम हुआ, कि ययोज्येष्ठ किसी भिक्षु के समीप काबुल नदीके दक्षिण नगर नामक स्थानमें जितने स्वीकार्य अपराधकी स्वीकारोक्ति करनी होगी। पवित्र स्मृति-चिह्न विद्यमान हैं, उतने कहीं नहीं है। उपास्य । हिद्दनगरीमें बुद्धदेवके मस्तकको हड्डी और चच गोलक पहले ही कहा जा चुका है, कि दीक्षाकालमें तीनकी स्वरूप पवित्र स्मृतिरक्षाके लिए तीन विहार प्रतिष्ठित हैं। शरण लेनी पड़ती थी। बौद्धोंके वही प्रधान उपास्य सिहल आदि दक्षिणदेशोंमें भी पवित्र स्मृतिका त्रिरत्न या तीन रत्नत्रय है, - - बुद्ध, धर्म और सङ्घ। ' अभाव नहीं है। सिंहलमें दन्तस्मृति सुप्रसिद्ध है। इसके अलावा और भी अनेक पदार्थ हैं, जो बौद्धोंके। इसके सिवा वहांके बौद्धोंका विश्वास है, कि जिन अर्थात् निकट सम्मान तथा अर्चनके विषय हैं, -साधुमहात्माओं- बुद्धदेवके स्कंधको हड्डो भो वहां क्षत है। थेर सरभूने की पवित्र स्मृतिका परिचायक कोई द्रध्य और उनके इसको श्मशानमें ले जा कर सिंहलमें रखा है। रुयना- स्मरणार्थ प्रतिष्ठित स्मृतिस्तम्भादि। इस समुदायका वेली नामक स्थानमें बुद्धदेवको अस्थि संरक्षित है, यह साधारण नाम है धातु । धातु तीन भागमें विभक्त है,--- भी प्रसिद्ध कथा है। शारीरिक, उदशिक और पारिभोगिक । शारीरिक-धातु पूर्व पूर्ण युगके वुद्धोंको कोई शरीरावशेषस्मृति शरीर सम्बन्धोय है; उद्देशिक- स्मरण उद्देश्यसे किसी भी स्थानमें रक्षित है, ऐसा सुना नहीं जाता। जो संस्थापित है; पारिभोगिक--जो सब द्रव्य बुद्धदेवके कितु यह सुननेमें आता है, कि श्रावस्ती नामक स्थानके व्यवहार में लगे हैं। एक स्तूपमें काश्यप बुद्धकी समस्त अस्थि संरक्षित है। बपुष और मल्लिक नामक दो धणिकोने जब बुद्धदेव परवत्तीं साधु और भिक्षु को अनेक स्मृति बहुतसे स्थान- का शिष्यत्व ग्रहण किया, तब उन्होंने कृपापरवश हो : में रक्षित है, इसका पता लगा है। ताप