पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५४७

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बौद्धधर्म भिक्षु ओंको पदमर्यादामें कोई विशेषता न थी। तब ऐसा ! प्रातिमोक्ष या दंडविधि। भी नहीं कह सकते, कि कोई श्रेणीविभाग न था। कार्यके प्रातिमोक्ष प्रधानतः आठ भागमें विभक्त था। भेदसे श्रेणीभेद होता था। जो उम्र में बड़े थे, वे . प्रत्येक अंशकी थोड़ी विधि नोचे दी जाती है,--- स्थविर' और जो छोटे थे वे 'दहर' कहलाने थे। इसके १म। कठिन अपराध करने पर अपराधी सङ्घसे अलावा उपाध्याय (शिक्षादाता). साह विहारी (सदस्य), : निकाल बहार कर दिया जाता था, सभी बौद्धग्रन्थका आचार्य ( अध्यापक ) और अन्त वासी ( शिक्षाथीं ) इन : इस सम्बन्धमें एक मत था। अपराधका विवरण (१) गण विभक्त थे। सिंहलमें भी कामरिपुके वशीभूत हो कर इन्द्रिय निग्रहका प्रतिज्ञाभङ्ग, ऐसा ही श्रेणीविभाग था ; किन्तु वहांके महानायक पद (२) चौर्य (३) प्राणनाश और ( ४ ) अलौकिक क्षमता- पर अधिष्ठित हो कर एक सिक्ष सभी कार्योकी देखभाल का कौशल दिखलाना। करते थे। महायानों में ऐसी प्रथा न थी। श्य। तरह प्रकारका अपराध । इसकी शास्ति भिक्षुओंका खाद्य । । थी किसी किसी निर्दिष्ट समयके लिए सङ्घसे वहि- घी, मक्खन, तेल, मधु, चीनी, मछली, मांस, दुध करण । और दही आदि खाद्य भिक्षु ओंके लिए निषिद्ध था। ३य। इस विभागके सम्बन्धमें दो विधान है। किन्तु कोई पीड़ाग्रस्त होनेसे आवश्यकतानुसार इनमेंसे ४थ। इसमें तिरसठ अपराधोंका उल्लेख है और किसी द्रव्यका व्यवहार कर सकते थे। फिर कहीं ऐसा नाना प्रन्थमे नानारूपसे सन्निवेशित हैं। दण्डग्रहण भी देखा जाता था, कि तीन प्रकारमें पवित्र होने पर द्वारा प्रायश्चित्त । मत्स्य और मांस भी खा सकते हैं। तोन प्रकार ये ५म। इस श्रेणोमें ९२ अनुशासनकी कथाए है। हैं-अदष्ट, अश्रु त और अमन्दिग्ध। इस निषेधको इन सब अपराधियोंकी शास्ति प्रायश्चित्त है। चीन कोई कार्यकारिता न थी। कहते हैं, कि बुद्धने स्वयं ही देशीय धर्मग्रन्थ और व्युत्पत्ति नामक ग्रन्थमें केवल शूकरका मांस खाया था। बास्तव में बात यह है, कि ६०का हो उल्लेख देखा जाता है। बौद्धगण इन सब विषयों में ब्राह्मणका पथानुसरण करते . ६ष्ट । चार प्रकारके अपराध - अपने मुखसे थे। मत्स्य मांसके व्यवहार में ब्राह्मणके लिए जितना अपराध स्वीकार करने पर ही उसका प्रतीकार होता है। निषेध है, भिक्षु ओंके लिए भी उतना ही है। उस समय म । शिक्षाकार्य-नाना विषयको नियमावली, देशमें जो व्यवस्था प्रचलित थी, बौद्धोंने अपने समाजमें उद्देश्य, सभ्यता और सदाचारको शिक्षा । पालिग्रन्थमें भी उसीका प्रवत्तन किया था। इनकी संख्या ७५, चीन देशीय प्रन्थमें १०० और बौद्धभिक्ष गण ( पुरुष या रमणी ) ब्रह्मचारियों की व्युत्पत्तिमें १०६ है। तरह अपना आहारीय द्रष्य भिक्षा द्वारा ही संग्रह करते थे म। आईन विषयक सात नीति । किन्तु प्रभेद यह था, कि ब्रह्मचारी भिक्षा मांगते थे, पर स्त्री-भिक्षु के लिए भी उक्त विधि प्रवर्तित हैं, तब भिक्षु ओंमें मांगनेकी रीति न थी। यदि कोई अपनी श्रेणीविभागमें कुछ परिवर्तन मालूम पड़ता है। किसी इच्छासे कुछ दे देता ले वही वे ले लेते थे। समाजमें नियम प्रवर्तन करनेसे सङ्घारामका शासन रोग होने पर औषधव्यवहार करनेको विधि थी। उस विधान करना आवश्यक है। बौद्धसमें भी शास्ति- समय घी, मक्खन, तेल, मधु और शक्कर औषधके रूपमें का विधान है; यद्यपि वह कठिन नहीं, तो भो यथेष्ट है । व्यवहार कर सकते थे। नानारूप औषध प्रस्तुत करने सर्वप्रधान शास्ति सङ्घसे वहिष्करण है; इससे निम्न- की विधि और विविध प्रकारके अस्त्रका विवरण बौद्ध- । स्तारको शास्ति है कुछ समयके लिए निर्वासन । एक प्रन्थमें मिलता है। इससे जान पड़ता है, कि प्रभूत और प्रकारकी शास्तिका नाम निःसारण है। निर्वासन उन्नति हुई थी। (महाबग्ग) और निःसारणमें पृथकता जानना कठिन है। निर्वासन Vol. xv. 136