पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५९५

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पचा- ब्रह्मचर्यप्रतिपा- ब्रह्मचारी ५८६ ४ जैनमतानुसार पाँच व्रतों से एक व्रत । इसके दो । ब्रह्मचर्यवत ( स० त्रि. ) ब्रह्मचर्य विद्यतेऽस्य मतुप मस्य भेद हैं-(१) एकदेश ब्रह्मचर्याणुव्रत और ( २ ) सर्वदेश व। ब्रह्मचर्ययुक्त, ब्रह्मचारी।। ब्रह्मचयमहावत। इस व्रतकी स्थिरताके लिए जैनागममें ब्रह्मचर्यानुवत जैनमतानुसार पांच अनुव्रतोंमेंसे चतुर्थ पांच पांच भावनाएं कही गई हैं। अणुयत । ब्रह्मचर्य देखो। इस व्रतकी रक्षार्थ स्त्रियों में प्रीति उत्पन्न करनेवाली ब्रह्मचारणी ( स० स्त्रो० ) ब्रह्मणा घेदेन चारयति आचर. कथाओंके सुननेका त्याग, उनके मनोहर अङ्गोंको तीति ब्रह्म-चर-स्वार्थे णिच् , कर्तरि ल्यु ङी । मार्गी । अनुरागसे देखनेका त्याग, पूर्व समयमें भोगे ब्रह्मचारी ( स० पु०) ब्रह्म-ज्ञानं तपो वा आचरतीति हुए स्त्री सम्भोगके स्मरण करनेका त्याग, कामोद्दीपक, : अर्जयत्यवश्यं ब्रह्म-चर-आवश्यके णिनि । १ प्रथमाश्रमी, पुष्टिकर और इन्द्रियों को उत्तेजित करनेवाले रसोंका, ब्रह्मचर्याश्रमी, उपनयनके बाद नियम-पूर्वक साङ्गधेदा- त्याग और शरीरको बहु शृङ्गारादिसे मोहक बनानेका : ध्ययन के लिए गुरुगृहमें अवस्थान करनेवाला ब्रह्मचारी। त्याग; ये पांच ब्रह्मचर्यव्रतकी भावनाएं हैं। गृहस्थ मनुसंहितामें ब्रह्मचर्याश्रम और ब्रह्मचारीके कर्त य इस गण एफदेश ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हैं, अर्थात् प्रकार लिखे हैं उपनयनके उपरान्त ही ब्रह्मचर्याश्रम आचार-सहित गृहस्थ स्वदारमें सन्तोष रहते हैं और विधेय है। उपनयन होते ही द्विजोंके प्रति विद्यादि आचार-रहित श्रावक मैथुनादिका परित्याग करते हैं । अथवा मधु-मांस वर्जनादि व्रतोंका आदेश और विधि सर्वदेश अर्थात पूर्ण ब्रह्मचर्य मुनिगण पालन करते हैं, . पूर्वक घेदग्रहणका भार अर्पित होता है । उपनयनके जो महाव्रतमें गणनीय है । जैनागममें इस व्रतको : समय जिस ब्रह्मचारीके प्रति जो चर्म, जो सूत्र, जो दृषित करनेवाले पांच अतीचार भी माने गये हैं। यथा--- मेखला, जो दण्ड और जो वसन विहित हैं, चाम्द्राय ___"परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमनानङ्गक्रीड़ा- णादि प्रतके समय भी वे ही विधेय हैं। गुरुकुलमें कामतीव्राभिनिवेशाः ॥” (मोक्षशास्त्र ७२८) पास करते समय ब्रह्मचारीको इन्द्रिय संयमपूर्वक अपने दूमरेके पुत्र पुत्रियोंका विवाह कराना. दूसरेको अदृष्टकी वृद्धिके लिए निम्नलिखित नियमोंका पालन प्याही व्यभिचारिणी स्त्रीके यहां आना जाना वा वचना करना चाहिए। प्रतिदिन स्नान करके शुद्धतासे देव, लाप करना, वेश्यादि व्यभिचारिणो स्त्रियोंके साथ लेन- ऋषि और पितृ-तर्पण, देवपूजा तथा सायं और प्रातः- देन आदि व्यवहार रखना, कामसेवनके अङ्गोंको छोड़ मसेवनके अङ्गोंको छोड़ कालमें मम्पूर्ण ममिध द्वाग होम करना उचित है। कर अन्य अनङ्गों द्वारा काम क्रीड़ा करना और अपनी ब्रह्मचारीके लिए मधु और मांस भोजन, गन्धद्रव्य सेवन, स्त्रीमें कामसेवनकी अत्यन्तवासना रखना; ये पांच माल्यानि धारण गड प्रति म ग्रहण और स्त्री-सम्भो. ब्रह्मचर्याणुव्रतके अतीचार हैं। गृहस्थ ब्रह्मचारियों को . गादि निषिद्ध है। जो पदार्थ म्वभावतः मधुर कितु इससे बचते रहना चाहिए । महाव्रती मुनियों का . कारण पा कर अम्ल हो जाते हैं, अर्थात् दधि इत्यादिका सेवन, प्राणियोंकी हिंसा, नैल द्वारा आपादमस्तक अभ्य होना ही ब्रह्मचर्य है।

अन, कजलादि द्वारा चक्षु-रञ्जन, पादुका व छत्र धारण,

ब्रह्मचर्यप्रतिमा-जैनमतानुसार श्रावक अर्थात् जैनगृहस्थों- लोगोंके साथ वृथा कलह, देश वार्तादिका अन्वेषण, को एकादश श्रेणियों से सप्तम श्रेणो। इस प्रतिमाको मिथ्या भाषण, कुत्सित अभिप्रायसे स्त्रियों के प्रति कटाक्ष पालन करनेवाले ब्रह्मचारी, सप्तमप्रतिमाधारी वा वणों, "। वा उनका आलिङ्गन और दूसरेके प्रति अनिष्टाचरण कहलाते हैं। इत्यादिसे ब्रह्मचारी निवृत्त रहा करते हैं। सर्वत्र एकाकी ब्रह्मचर्यमहाव्रत--जैनमतानुसार मुनिगण द्वारा पालनाय शयन करना चाहिए और कदापि हस्तव्यापारादि द्वारा त्रयोदश प्रकार सम्यक् चरित्नमेसे एक चरित्र और पंच . विध महावों से एक व्रत। रेतःपात न करना चाहिए। कामवश रेतःपात करनेसे नधी' शब्दमें मुनिधर्म देखो। आत्मवत बिलकुल ही नष्ट हो जाता है और तो क्या, Vol, xv. 148