पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६०३

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५७ शिखर पर ब्रह्मवासीका विख्यात बौद्धतीर्थ शेवदगोन किया था, उसमें आराकान, थस्तुन, मार्सावान और पेगु मन्दिर अवस्थित है। पौङ्गलौङ्ग नामक गिरिमाला गे ही चार राज्य थे । इन्हीं चार राज्योंके इतिहाससे जाना सित्तौड़ और सालवीन उपत्यकाके बीच विस्तृत है। जाता है, कि यहांके राजा अपनेको भारतीय हिन्दूवंशो- तौङ्ग-गु प्रदेशके सन्निकट इसका एक शिखर ६ हजार द्भव बतलाते थे। उनका धर्म और शास्त्रंथ भारत- फोटसे भी अधिक ऊँचा है। वर्षसे हा लाया गया था, इसमें सन्देह नहीं। एक __ यहां कई छोटे छोटे ह्रद भी नजर आते हैं, उनमेंसे समय जो यहां भारतीय संस्रव हुआ था, उसका प्रमाण रंगूनके निकटवर्ती कन्दवर्ग, हानजादा जिलेका 'तू' टलेमो लिखित ईरावती नदीके डेल्टा वंशवत्ती स्थान- नामक ह्रद और वेसिन जिलेके दो हद उल्लेखयोग्य हैं। समूहकी भौगोलिक तालिकासे मिलता है। किसी तरह- पेगु और सित्तौङ्ग तथा रंगून और इरावतीको मिलाने का प्राचीन इतिहास न मिलने पर भी रंगून और रामन्न- वालो दो खाई वाणिज्य तथा कृषिकार्य की विशेष उप- देशसे इधर उधर पड़ी हुई जो सब बहुप्राचीन कीत्तिसमूह कारी है। आविष्कृत हुई हैं, उनसे भी भारतीय हिन्दूका ब्रह्मदेश एशिया महादेशके दक्षिण भागमें तीन प्रायद्वीप जाना सूचित होता है। समुद्रमें घुस गये हैं। अरव और भारतवषके साथ ___ आराकान के ब्रह्मराजका इतिहास पढ़नेसे जाना जाता प्राचीन जगत्को ऐतिहासिक घटनावली जैसी मिलती है, कि गोतपबुद्धसे बहुत पहले एक बाराणसी-राजपुत्रने जुलती है, इस ब्रह्मदेशका वैसा कोई ऐतिहासिक वैभव आराकान आ कर वर्तमान सान्दावयके निकट रामा- नहीं है। विद्योन्नति, धर्म या वाणिज्य-विस्तारका कोई वती नगरमें राजधानी बसाई थी। वे प्रति वर्ष वारा. प्रसङ्ग हो नहीं देखा जाता है। महाभारतके सभापर्वम णसीराजको कर देते थे। इसी प्रकार कुछ दिन बीत 'शर्मक' और 'वर्मक' नामक दो देशोंका उल्लेख है। कोई जाने पर वाराणसी राज शेषयवतो (जिन्होंने दूसरे जन्म कोई इन्हीं दोनोंको यथाक्रम श्याम और ब्रह्मदेश बतलाते | में गौतमबुद्धरूपमें जन्म लिया था ) अपने चतुर्थ पुल हैं। महाभारतके समय यह स्थान किरात और भगदत्त कन्मिनके ऊपर ब्रह्मराज्यका शासन-भार सौंप गए। के अधिकारमुक्त था। भारतवर्ष में आयहिन्दुओंका उप- उक्त राजपुत्रने ब्रम, श्याम और मलयवासियोंके ऊपर निवेश स्थापित होनेके बाद जो बाणिज्य प्रभाव पूर्वमें अपना आधिपत्य जमाया था। उनके राज्यकी उत्तर चीन और पश्चिममें इजिप्ट आदि स्थानोंमें फैला हुआ भीमा मणिपुरसे ले कर चीन तक फैली हुई थी। था, वह ब्रह्मराज्य तक नहीं जा सका, यह कौन कह ! कन्मिन अपने राज्यमें बहुत-सी असभ्य जातियोंको बसा सकता है ? केवल टलेमीके भूगोलनान्तसे इस स्थान गए थे। इस गल्पको कोई सत्यता न रहने पर भी इसके का Aurc chersonesus अर्थात् सुवर्णभूमि नाम पाया द्वारा ब्रह्ममें भारतीय सस्रव और बौद्धधर्मके प्रवेशलाभके जाता है। पूर्वोक्त दोनों प्रायद्वीपकी तरह अब भी धीरे धीरे धर्मप्रभाव विस्तृत हुआ था, किन्तु बड़े दुःखकी बात

  • Dr. IForchhammer और Major R.C. Temple

है, कि उस धर्मस्त्रोत पड कर भो अधिवासीगण आनन्द इन दोनों महादयके अनुसन्धानसे ब्रह्मदेशके प्रत्नतत्त्वका नूतनद्वार उद्घाटित हुआ है। लाभ न कर सके। अहिंसाकी महिमा प्राप्त न कर | सकनेके कारण उन्होंने प्रतिहिंसाके विपसे जर्जरित होन ब्रह्मके प्राचीन ऐतिहासिकगण यहां बड़े भारी भ्रममे पड़े कर अपनी वासभूमि रणक्षेत्रमें परिणत की थी। परस्पर-! थे। शाक्यवंशमें गौतम बुद्धका जन्म और उनका दूसरा नाम की उन्नतिसे ईर्षान्वित हो कर उन्होंने पाव वत्ती राज्य शाक्यसिंह हानेके कारण उन्होंने शाक्य (शेक्यवती)-के बुद्ध- खाकमें मिला दिया। जन्मत्वकी कल्पना की है। वे फिर गौतमीपुत्र शाक्यका मुदत्य- अन्रेजोंने पहले ब्रह्मदेशका जो अंश अपने अधिकारमें लाभके कारण नामांतर स्वीकार करते हैं। Vol. xv. 150