पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/६४१

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बामसमाज ईश्वरोपासना करते थे। ऐसे भजनालयमें विशुद्धभाव- साधानाके अनुसार बह्मोपासना करेंगे, इससे बढ़ कर से उपासना होती थी, ऐसा उनकी छोटी सी पुस्तिका उनकी प्रार्थनीय वस्तु और क्या हो सकती थो? उनके बन्धुगण उद्योग करने लगे। थोड़े ही समयमें येदविधि- • राममोहन राय ईसाई धर्म के विशोधन-कार्यमें अनु- सम्मत एक उपासना-सभा स्थापित हो गई। अनेकोंकी रक्त हो कर उसके अनुकूल इतने अग्रसर हो गये थे, कि स्वतः प्रवृत्त चेष्टासे जिसकी उत्पत्ति हुई, उसकी बढ़ गिर्जा-प्रकरणमें उपासना-विधि पूर्वाभ्यस्त न होने पर प्रतिष्ठा आकांक्षणीय है। वही आजकलका यह अशीति- भी उस समय उन्होंने ईसाइयोंके साथ तादृश उपासना वर्ष देशीय ब्राह्मसमाज है। करनेको अपना कर्तव्य समझा था। उन्होंने महात्मा राममोहन राय जय रंगपुरमें नाना सम्प्र- अपने पूर्व संस्कारके अनुसार “गायत्रया ब्रह्मो- दायोंके उपासकोंके साथ एकत्र हो कर धर्मानुशीलनमें पासनाविधानं" अर्थात् गायत्रो जप और तदनुयायो ब्रह्म रत थे, तभीसे एक नूतन धर्म-सभाका सूत्रपात हुआ चिम्तन द्वारा उपासना-विधान संस्कृत भाषामें प्रकाशित था। कलकत्ता आ कर उन्होंने वास्तवमें एक आत्मीय किया और बादमें उसका अंग्रेजी अनुवाद भी किया। सभाका संगठन कर डाला। इस सभा घेदका पाठ अंग्रेजो पाठकोंमेंसे जो शब्द:ब्रह्म वा सर्वत्र ब्रह्मदश न. और ईश्वरके उद्देशसे स्तुति-गीत होते थे। कुछ दिन का तत्व न समझ सकते थे, उनके लिए वे उतने अंशको बाद हिन्दू और ईसाई मतके बहुदेवोपासकोंके साथ व्याख्या भी लिख गये हैं। वादानुवादमें तथा . सहमरण-विषयका महा आन्दोलनमें धर क्रमशः आदम साहबका गिर्जा लोक शून्य होने प्रवृत होनेसे राममोहन राय फिर इस आत्मीय सभाको लगा। उस समय एकेश्वरवादी ईसायोंका एक स्वतन्त्र रक्षा न कर सके। ४. वर्ष तक यथानियमसे अपना उद्देश साधन कर वह सभा ट्रट गई। उसके १० वर्ष दायके एकेश्वरवादी भो अन्य पन्था देखने लगे, इसलिये बाद नवीन उदामसे तथा प्रशस्तर पत्तनसे वर्तमान राममोहनने अपने प्रयत्नोंको गति बदल दो थो। ब्राह्मसमाजकी प्रतिष्ठा हुई। ____ कहा जाता है, कि एक दिन एकेश्वरवादी ईसाईयोंके शक सं० १७५०के, भाद्रपद मासमें (ई० सन् १८२८) उपासनालयसे लौटते समय राममोहन रायके हमेशाके यह ममा स्थापित हुई * । इस सभामें राममोहनराय साथो ताराचंद चक्रवतीं और चन्द्रशेखर देवने कहा कि साधारण व्यक्तिके समान एक उपासक मात्र गिने जाते "हम पराए समाजमें क्यों जाते हैं; हमारा अपना एक थे। प्रति समाह इस सभाका अधिवेशन होता था। उपासनालय होना चाहिए।" राममोहन भी ऐसा हो सूर्यास्तके कुछ पहलेसे प्रारम्भ कर कुछ रात्रि तक चाहते थे। धीरे धीरे अपने समाजका मत विशोधन इसका कार्य होता था। सभा भवनके एक पाव में करना उनका अभिप्रेत था । वे अपने संस्कार, शिक्षा और द्रो तैलङ्ग ब्राह्मण बैट कर वेद पाठ करते थे। सूर्य के अस्तगत होने पर उत्सवानन्द विद्यावागीश सभा-भषनमें आ कर उपनिषद्का पाठ और उसकी व्याख्या करते

  • १७४६ शक सं०में 'बङ्गला हरकरा' नामक अङ्गरेजी

संवादपत्रके कार्यालयके ऊपरके हिस्सेमें सप्ताहमें एक दिन आदम साहब श्वरोपदेश देते थे। राममोहन राय, उनके भानजे, पुत्र कलकत्ताके जोड़ासाको मुहल्लेमें कमललोचन व के तथा अन्यान्य कुटुम्बीजन, ताराचंद्र चक्रवर्ती और चंद्रशेखर देव मकान पर इस सभाकी पूथम पूतिष्ठा हुई थी। इसके बारह वर्ष वहां उपस्थित रहते थे। (तत्त्वबोधिनी पत्रिका, बैशाख, शक पहले इस मकानमें हिंदू कालेजका कार्य हु भा था । उत्तरकालमें सं० १७६६ ) इससे पहले स्थानाभावके कारण कभी कभी राम- (१८३०.ई.) इस मकानमें डफ् साहबने जनरल एसेमिलन मोहनरायके स्कूल वाले मकान में भी आदम साहबका यह उपदेश | इन्सटिटिउशनका कार्यारम्भ किया था। इस सामान्य मकानका हुआ करता था। परिचय इतिहासके योग्य विषय हो गया है। .: ::