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पथ चलनेसे ही अगस्त्यभ्राताका महा श्रीमान् आश्रम देख पड़ेगा। वाल्मीकिने यह न बताया, कि अगस्त्यके भाई कौन थे। किन्तु स्वामिकृत टीकामें लिखा गया है, कि उनका नाम इध्मावाह था। यथा— "तव्रागम्ल्यभ्रात्राश्रमे इध्मवाहेति अस्य नाम। अगस्त्यः प्राग्दुहितरमुपयेमे धृतव्रताबामस्यां दृढ़व्रतो ज्ञात इध्मवाहात्मजमुनिरिति भागवतं तु देवराञ्च मुतोत्पत्तिरिति न्वायेनेत्ये के।" अगस्त्यमुनिका आश्रम भी एक स्थानमें न था। सुतीक्ष्णमुनिने रामको जिस प्रकारसे पथ बताया, उसके अनुसारसे दण्डकारण्यमें उनका आश्रम होना चाहिये। दण्डकारण्य गोदावरीके उत्तर-कूलमें, आधुनिक बरारकी पूर्व-उत्तर-सीमा है। महाभारतके मतसे अगस्त्याश्रम गयाके निकटमें था। वन ९७-९६ अ॰ देखो। इन मुनिका असाधारण तपोबल है। इन्होंने देवताओंके अनुरोधसे सागरको शोषण किया, इल्वल और वातापि असुरको नष्ट कर डाला। विन्ध्याचलने सूर्य्य पथको रोध करनेके लिये संकल्प किया था, इन्होंने उस पर्व्वतके दर्पको चूर्ण कर डाला। दण्डकारण्यवाले अपने आश्रममें पहुंचनेपर महर्षिने रामको वैष्णवधनु, ब्रह्मदत्त शर, अक्षय तूणीर और खङ्ग दिया था। किन्तु इतना प्रताप होते भी अगस्त्यमुनि नहुषराजकी पालकी लिये-लिये घूमते थे। एक दिन महाराज शिविका पर बेठे जा रहे थे, हठात् उनका पैर महर्षिके शरीरसे छू गया। इसी अपराध पर अगस्त्यने नहुषराजको सर्प बना दिया। महाभारत वनपर्व्व देखो। विन्ध्यगिरिका दर्पहरण करनेके बाद अगस्त्यमुनिने दाक्षिणात्यमें जा अवस्थिति की थी। द्राविड़ादि अञ्चलोंके अधिवासियोंने उनसे नाना प्रकारका विद्याध्ययन किया। युरोपीय पण्डित अनुमान करते हैं, कि अगस्त्य तिब्बत देशके मनुष्य थे। यह महर्षि आजकल नक्षत्ररूपसे आकाशके दक्षिणदिक्में अबस्थिति करते हैं। अगस्त्यने एकबार इन्द्रको निकाल मरुत्को ही इविः देनेका विचार किया था, जिससे इन्द्र बहुत
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असन्तुष्ट हुए। किन्तु अन्तमें बड़े यत्नसे इन्होंने इन्द्रको मना लिया। अथर्ववेद में इनके गुण और तपकी बड़ी प्रशंसा लिखी है। अगस्त्यकूट (सं॰ पु॰) दक्षिणका वह पर्व्वत, जिससे ताम्रपर्णी नदी बही है।
अगस्त्यगीता (सं॰ स्त्री॰) अगस्त्येन गीता विद्या। शान्तिपर्वमें लिखी अगस्त्योक्त विद्या।
अगस्त्यचार (सं॰ स्त्री॰) अगस्त्यस्य चारः। १ अगस्त्य नक्षत्रकी शुभाशुभ फलसूचक दक्षिणदिक्को गति। २ अगस्त्यनक्षत्रका उदय।
अगस्त्यसंहिता (सं॰ स्त्री॰) अगस्त्येन लिखिता संहिता। सम् सम्यक् हितं मङ्गलं प्रतिपाद्यं यस्याम्। सम्-धा-क्त। अगस्त्यमुनिका रचित शास्त्रविशेष।
अगस्त्यहर्र (हिं॰ स्त्री॰) अगस्त्यहरोतकी। कास, श्वास, और अजीर्णकी एक औषधि।
अगस्त्योदय (सं॰ पु॰) नक्षत्ररूपण दक्षिणस्यां दिशि अगस्त्यस्य उदयः। दक्षिणदिक्में अगस्त्यनक्षत्रका (Canopus) उदय। सौर भाद्रमासके सत्रहवें दिवसमें अगस्त्यका उदय होता है। भाद्र मासके तीन दिन बाक़ी रहनेसे ब्राह्मण अगस्त्यनक्षत्र और उनकी पत्नी लोपामुद्राको अर्व्य देते हैं। पहले शङ्खके भीतर जल, श्वेतपुष्प और आतप तण्डुल डाल और दक्षिणमुख बैठकर यह मन्त्र पढ़ना चाहिये—
"काशपुष्पप्रतीकाश अग्रिमारुतसम्भव। लोपामुद्राका अर्घ्यदानमन्त्रअर्घ्यदानमन्त्र— "लोपामुद्रे महाभारी राजपुत्रि पतिव्रते। अगह (हिं॰ वि॰) १ जो लिया न जा सके। २ चुलबुला। ३ वर्णनातीत। ४ कठिन।
अगहन (हिं॰ पु॰) अग्रहायण। वेदकी पुरानी चालसे वर्षका पहिला, किन्तु आधुनिकसे नवां महीना। मार्गशीर्ष।
अगहनिया (हि॰ वि॰) अग्रहायणी। मार्गशीर्षमें उत्पुन्न होनेवाला। अगहनका।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१०८
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अगस्त्य—अगहनिया