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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/५१

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अक्षयवट—अक्षरचण
हैं। भक्तिपूर्व्वक वटवृक्षमें जल चढ़ानेसे अक्षयफल मिलता है। प्रयागका अक्षयवट इस समय क़िलेके भीतर पड़ और बहुत छोटा हो गया है; सम्भवतः छायामें रहनेके कारण यह बढ़ता नहीं। जगन्नाथजीमें भी अक्षयवट रहनेकी कथा मिलती है।
प्रयागका अक्षयवट बहुत ही प्राचीन वृक्ष है। पहले यह खुली जगहमें था, धीरे-धीरे इसकी चारों ओर मट्टीका भराव हो गया, सुतरां वृक्ष भी नीचे पड़ गया। प्रयागदुर्गके भीतर एलनबरा-बारिकके ठीक पूर्व्व एक पुराना मन्दिर है, जिसके पास यह अक्षयवट अवस्थित है। इस जगह इस वृक्षको न धूप लगती और न हवा मिलती है, इसीसे यह बढ़ता भी नहीं। चीनके यात्री (साधु) युअन्-चुअङ्ग् इस प्राचीन मन्दिरका उल्लेख अपनी यात्राके प्रसङ्गमें कर गये हैं। इसकी दक्षिण ओर सम्राट् अशोक और समुद्रगुप्तका स्तम्भलेख है। पहले अक्षयवट वेणीघाटसे बहुत दूर था; धीरे-धीरे बाढ़ आनेसे गङ्गा-यमुना इसके पास पहुँच गईं। अकबर बादशाहके समय हिन्दू लोग इसी वृक्षके मूलसे गङ्गामें कूदकर प्राणत्याग करते थे। आजकल फिर क़िलेके नीचे बहुत दूर तक रेत पड़ गई है। वेणीका घाट अब अक्षयवटके निकट नहीं है। प्रयाग जा तीर्थयात्री अक्षयवटके दर्शन करते हैं, पहले दर्शन करनेमें उन्हें बड़ी असुविधा होती थी। इच्छा करनेसे कोई व्यक्ति क़िलेके भीतर न जा सकता था। पण्डा लोग यत्न करके यात्रियोंको ले जाते थे। अब लोग मजेमें जा सकते हैं। अक्षयवटकी चारों ओर पक्की चुनाई (गुंथाई) को छत है और गड्ढे भीतर बड़ा ही अँधेरा रहता है, कोई चीज़ स्पष्ट नहीं दिखलाई पड़ती। सिड्डीसे उतर नीचे दर्शन करने जाना होता है। पुराणोंमें लिखा है, कि इस वृक्षकी पूजा करनेसे अक्षयफल मिलता है।
गयाक्षेत्रमें भी एक अक्षयवट है। पाण्डवोंने वनवासमें लोमश ऋषिके उपदेशानुसार इस वृक्षका दर्शन किया था। (महाभारत—वनपर्व।)
अक्षयवृक्ष (सं॰ पु॰) अक्षयवट।

अक्षयललिता (सं॰ स्त्री॰) भादों महीनेको सातवीं तिथि। इस तिथिको स्त्रियाँ शिवदुर्गाकी पूजा करती हैं।
अक्षया (सं॰ स्त्री॰) अक्षयतृतीया। सोमवारको अमावस्या, रविवारको सप्तमी, मङ्गलवारको चतुर्थी होनेसे अक्षया कहाती है।
अक्षयिणी (सं॰ स्त्री॰) काश्मीरकी एक देवप्रतिमा, महाराज नरेन्द्रादित्यने भुवनेश्वर नामके एक देवता और अक्षयिणी नामकी एक देवीकी मूर्त्ति प्रतिष्ठित की थी।
अक्षय्य (सं॰ क्ली॰) घृतमधुयुक्त जल, जो श्राद्ध में पिण्डदानके पीछे देते हैं।
अक्षय्योदक (सं॰ क्ली॰) पिण्डदानके पीछे मधु तिल मिला जल देकर श्राद्ध करना।
अक्षर (सं॰ पु॰-क्ली॰) न-क्षर-अच्। १ अच्युत। २ स्थिर। ३ अविनाशी, नाश न होनेवाला। ४ नित्य। ५ अकारादि वर्ण। हरफ़। मनुष्यके मुखसे निकली हुई सार्थक ध्वनिको सूचित करनेवाले सङ्केत।
तन्त्रमें पांच प्रकारके अक्षरोंका उल्लेख है—१ मुद्रालिपि, २ शिल्पलिपि, ३ लेखनीसम्भवा लिपि, ४ गुण्डिका और ५ घूणाक्षर। मुद्रालिपि अर्थात् अँगुलीके अँगूठे इत्यादिसे छापना; शिल्पलिपि अर्थात् चित्रकारी इत्यादि; लेखनीसम्भवा लिपि, लेखनीसे जो लिखी जाये; गुण्डिका, जो चावल आदिके चूर्ण (आटा) से या इसी प्रकारकी और चीज़ोंसे लिखी जाय अर्थात् अलिपना इत्यादि; घूणाक्षर, घुन कीड़ा लकड़ीमें तरह-तरहकी रेखायें बनाया करता है और कोई-कोई उसकी रेखा लेखनीसे लिखे अक्षरकी भांति भी देख पड़ती है। अङ्गरेज़ी शोर्टहाण्ड (Short hand) भी ऐसा हो होता है।

अक्षरलिपि देखो।

६ ब्रह्म। ७ गगन। ८ धर्म्म। ९ तपस्या। १० अपामार्ग वृक्ष, आपां चिचड़ा, आघाड़ा (Achyranthes aspera)। ११ मोक्ष। १२ जल।
अक्षरचण, अक्षरचुञ्चु (सं॰ पु॰) लेखक, सुलेखक, पण्डित, उत्तम अक्षरोंका बनानेवाला। मुंशीये हफ़्त क़लम। अक्षरचञ्चु।

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