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लोग इनके घर आकर अतिथि हुये। इन्होंने देखा, 'बड़ा ही विकट है। मैं दरिद्र निर्धन हूँ। हमें अन्न का संस्थान नहीं। कैसे इतने लोगों की मनस्तुष्टि की जायेगी।' इनका मन अस्थिर पड़ गया था। यह गृहान्तर में जा सोचने लगे। उधर भगवान् ने कबीर का रूप बना और अतिथियों को धनरत्न से सजा विदा कर दिया। इन्होंने घर पर यह अपूर्व घटना सुनी। फिर कबीर कहाँ स्थिर रह सकते थे! प्राण छोड़-छोड़ यह केवल इष्टदेव को पुकारने लगे। किसी दिन इन्होंने राजसभा पहुँच एक अञ्जलि जल भर पूर्वमुख फेंका था। राजा इन्हें पागल समझ हँस पड़े। उस समय इन्होंने निर्भय राजा को सम्बोधन कर कहा था, — राजन्! हँसने का कोई कारण नहीं, जगन्नाथपुरी में किसी पूजक ब्राह्मण के पैर पर उबलता ओदन गिर पड़ा है। मैंने उसके पैर पर शीतल जल डाला। कबीर की बात से राजा को बड़ा कौतूहल लगा था। उन्होंने जगन्नाथपुरी को दूत भेजा। चर ने लौट कबीर की बात सप्रमाण की थी। फिर राजा ने कबीर को एक सिद्धपुरुष ठहरा लिया। साक्षात् करने को वह स्वयं इनके घर जा पहुँचे। कबीर राजा को अपने क्षुद्र कुटीर में देख अतिशय आह्लादित हुये और हाथ जोड़ कहने लगे, 'महाराज! आपके आगमन से यह दास कृतार्थ हुआ, शिष्य को कुछ करने के लिये आदेश दीजिये।' राजा ने इन्हें आलिङ्गन कर कहा, हे वैष्णव! आप हमारा दोष ग्रहण न कीजिये। हमने बेसमझ आप का उपहास किया है। बतलाइये, क्या करने से आप सुखी होंगे। धनरत्न जो चाहिये, हम अभी देने को प्रस्तुत हैं। इन्होंने सहास्यमुख उत्तर दिया था, — "राजन्! धनरत्न का क्या प्रयोजन है। जीवन और मरण सब समान होते हैं। मैं मूर्ख हूँ, इस तुच्छ जीविकानिर्वाह के लिये धन नहीं चाहता। जो दीन-दरिद्र, आतुर और अर्थ के लिये लालायित हैं, अपनी इच्छानुसार उसे धन दीजिये। आप का मङ्गल होगा।" राजा चकित हो निज प्रासाद को लौटे थे। |
उसी दिन उन्होंने राज्यमय घोषणा की — कबीर हमको अति प्रिय हैं।
कुछ दिन पीछे यह तीर्थयात्रा को निकले और मथुरा दर्शन कर दिल्ली पहुँचे थे। उस समय दिल्ली में मुसल्मानराज सिकन्दर लोदी का राजत्व रहा। दुष्टों ने जाकर सुलतान से कह दिया — एक धार्मिक जुलाहा आकर धर्म की वञ्चना करता है। ऐसे व्यक्ति को राजदण्ड मिलना उचित है। सिकन्दर ने कबीर को पकड़ने के लिये आदेश लगाया था। यथासमय राजपुरुषों ने इन्हें पकड़ लिया। फिर इन्होंने उनके मुख से आपद्ण्ड मिलने की बात सुनी। सिकन्दर के समीप पहुँचने पर पारिषदों ने इनसे नमस्कार करने को कहा था। किन्तु इन्होंने उनकी बात पर कर्णपात न किया और इससे हँसते सुना दिया — किसको प्रणाम किया जाये, इस संसार में कौन वन्द्य नहीं। फिर सुलतान ने अति क्रुद्ध हो और लौह शृङ्खल से आबद्ध कर यमुना के अगाध सलिल में डालने का उपाय निकाला था। राजपुरुषों ने तत्क्षण कबीर को यमुना के जल में निक्षेप किया। कालिन्दी के कृष्ण नीर में इनका देह अदृश्य हो गया। किन्तु परक्षण ही सकल ने यमुना के परपार इन्हें सहास्य मुख घूमते देखा। दुष्ट लोगों ने सुलतान से जाकर कह दिया — 'कबीर ऐन्द्रजालिक है। सामान्य इन्द्रजाल-विद्या के प्रभाव से निश्चय उन्हें रक्षा मिली है, इस बार अग्नि के मध्य निक्षेप कराइये।' दिलीश्वर ने दुष्टों की बातों में पड़ राजपुरुष बुला कर इन्हें महान् अनल में डालने को कहा था। किन्तु कैसा आश्चर्य, ज्वलन्त अग्नि में इनका एक केश नष्ट न हुआ। कबीर की इस अमानुष घटना से भी दिलीश्वर को चैतन्य आया न था। उन्होंने क्रोध से उन्मत्त और दुर्जनों की बात के वशीभूत हो हाथी के पैर नीचे इन्हें दबा मार डालने का आदेश दिया। किन्तु भगवान् जिस पर सदय रहते हैं, हज़ार हाथी भी उसका क्या कर सकते हैं। आज मतवाला हाथी भी इनका सिंहरूप देख भय से भाग गया। |
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कबीर