|
हाथ है। कान्दाहारने रेशम और जनके कपड़े बहुस बनते हैं। लाखको खेती भी अधिक होती है। मैवाकी कोई कमी नहीं। शुष्क फल यहांका प्रधान खाद्य है। कान्दाहारी वेगम-बादशाह शाहजहानको प्रथमा महिषो। वह पारस्यराज इस्माइल शाह (म) के वंशोद्भव सुलतान मिर्जाशफीको कन्या चौं। सम्राट् पकवरने पारस्यरान शाह पब्बासको कान्दाहारका शासनमार सौंपा था। किन्तु उन्होंने वह कार्य सुलतान हुसेन मिर्जाके हस्त अर्पण किया। हुसेन मिर्जाके मरने पर उनके पुत्र मुजफ्फर हुसेनको कान्दाहारका शासनभार मिला था। वह १५८२ ई० को तीन भ्राता साथ ले प्रश्वरको सभामें पहुंचे। अकबरने उनको सम्बर्धना कर पांच हजारीका पद और सम्भल नामक स्थान जागीर दी थी। कान्दा- 'हारी वेगम उनकी भगिनी थौं। १६१० ई. को इन सुन्दरी रमणोके साथ युवराज खुरम (शाहजहान्) का विवाह हुमा । - भागरके कंधारीबाग़ नामक उद्याममें कान्दाहारी बेगमको समाधि दिया गया। उनका समाधिमन्दिर अति सुन्दर है। आजकल वह भरतपुररानके अधिकारमें है। कांदि-बङ्गाल प्रान्तके मुर्शिदाबाद जिलेका उपविभाग। उसका परिमाणफल ३८८ वर्ग मील है। उसमें कांदि, भरतपुर पौर खड़गांव तीन थाने लगते हैं। वीरभूमसे मयूराशी नदी जाकर जहां मुर्शिदाबाद जिलेमें घुसी है वहीं कांदि नगरी बसी हैं। पायकपाड़ेके राजाओंका वहां आदिवास है। उक्त राजवंशके आदिपुरुष गङ्गा गोविन्द सिंहने कान्दिमें हो जन्म लिया था। उन्होंने २० लाख रुपये लगा अपनी माताका बाह किया। और अभ्यागतोंको ब्राह्मण वाहकों को डाक बैठा हाथों हाथ जगनाथसे ताज़ा प्रसाद मंगा खिला दिया। कान्दिगभूत (सं०नि०) कां दिशं गच्छामि, इत्या- कुखीभूतः, कान्दिश-भूता। १ पलायित, दूदे राजन न पानवाया, भगोड़ा। २ भोत, डरा हुवा । "सबपरित भयानमात् विमुक्ती नामवस्तदा ।" बान्दिग्भूतो नौविताओं प्रद्रावोगरा दिगम्।" (भारत, शान्ति, १०)}, |
कान्दिशीक (सं० पु.) 'कां दिशं यामि' इत्येवं वादिनो .. ठक प्रत्य येन. पृषोदरादित्वात् सिई। यदवा कदि वैलव्ये भावे इन्, कन्दि वैलव्यं ; शौक सेचने भावे धन, थोकः पश्रुपात: ; कन्दिय शोकय तौ विद्यते अस्य कदिशीक प्रण। भय देखकर पला- उनकारी, डासे भगनेवाला। कान्दू ( काण्डु ) बङ्गाल पौर विहार प्रान्तवासी एक जाति कहीं कहीं उसे भड़मूना, भुरजी आदि. भी कहते हैं। शस्यकण्डन ही इस जातिको प्रधान कान्यकुम ( सं० ली.) कन्याः कुनाः यन, कन्यकुनउप जीविका थी। स्वार्थ अण्। १ देशविशेष, एकमुल्क। हिन्दी में इसे कनौज कहते है। संस्कृत पर्याय-महोदय, कन्याकुन गाधिपुर, कौश और कुथस्थल है। रामायणमें चिखा है कि राजर्षि कुमनामके औरस और कृताची अप्सराके गर्भसे १०० कन्याओंने जन्म लिया था। उनका रूप. यौवन देख वायुदेव कामातुर हुये। किन्तु विना पिताको प्राजाके कन्याने उनसे सहवास करना खोकार न किया। इसपर वायुदेवने उन्हें माप दे कुबड़ी बना दिया। पिताने प्रसन्न हो अपनी कन्यायका विवाह कम्पिक्ष नगरकै राना ब्रह्मदत्तसे किया था। उनके स्म से कन्यव को कुलता मिट गई। २ ब्राह्मण जातिविशेष ।कनौजिया देखो। कान्यकुक्षी । (सं० स्त्री.) कान्यकुन-डीए। कान्यकुन देशको स्वी। कान्यना (सं० स्त्री० ) कात् जलात् अन्यम्मिन् जायते क-पन्य-जन्-ड-टा। नतीनामक गबद्रव्य, एक खुशबूदार चीज। कान्ह (हि.पु.) बोलण। कामहा देखी।कान्हड़ा कानडी (हि) कांटो देखो। कान्हम (हि० पु. ) छष्णवण भूमि, काली मिट्टी की जमीन । यह भड़ोंचको पोर होती है। इसमें कपास बहुत उपजती पौर पनपती है। काममी (हि.सी.) कर्पामविशेष, एक कपास। यह भड़ोंचकी ओर . काहम भूमिमें उपवती है। |
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८९
दिखावट
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३९.
कान्दाहारी वेगम, कान्हमो