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बामरचि (सं. स्त्री.) पनविशेष, एक इथियार । विखामिवने इसे रामचन्द्रको पत्रके प्रख विफल करनेके लिये दिया था। कामरू (हिं.) कामरूप देखो।
कामरूप (सं.वि.) कामं मनो रूपं यस्य, बहुब्री. १ मनोन रूपविधिष्ट, खूबसुरत। २इच्छानुसार विविध रूपधारी, म के मुवाफिक तरह तरहको सूरत बनानेवाला।
इस जिलेका प्राकृतिक दृश्य पति मनोहर है। भूमि बहुत उर्वरा है। ब्रह्मपुत्रके तौरका स्थान नीचा रहनेसे वर्षाकालमें डब जाता है। यहां धान्य और सर्षप अपर्याप्त उत्पन होता है। शर, वंश प्रमृति स्वभावतः अधिक निकलता है। ब्रह्मपुत्रके तौरसे पागे उत्तर भूटान और दक्षिण खसिया पहाड़ तक भूमि क्रमशः उच्च एवं समतल है। ब्रह्मपुत्रके दक्षिण इस जिले में बहुतसे छोटे छोटे पहाड़ है। उनमें एक एक दो हजारसे तीन हजार फीट तक ऊंचा है। उक्त पर्वतोंके पाच देशमें चायके बाग है।
ब्रह्मपुत्रके मध्य कई क्षुद्र शुद्र होप है, इसकी संख्या नहीं।-बधपुनमें रेत पड़नसे शितने दीप बनते और बिगड़ते हैं। कामरूपके पर्वतीय कई क्षुद्र नदी निकली हैं। श्रीभकास प्रायः उनमें जच नहीं रहता। फिर भी बा भीतर भीतर बहा करती। |
यहां नाला या नहर नहीं। किन्तु शस्य की रक्षाके लिये बीच बीच सामान्य बाँध मौजूद हैं। इस भूभागमें प्रायः १३० वर्गमोल जंग है। इस जङ्गलसे भी गवरनमेण्टको यथेष्ट पाय होता है। इसमें कुलसी नदीके तौरका वनविभाग प्रधान । जिस लिस वनसे रुपया पासा, इसमें बड़हार, दिमल्या, पस्तान, मयरापुर और बरवै नामक धन उखयोग्य दिखाता है। वनमें साखू, शोधम, तुन, सूम, नाहर प्रभृति वध यथेष्ट उपजते हैं। उनसे खूध कीमती कड़ियाँ, बरगे और तख्ते बनाते हैं। लालुङ्ग, कहारी, गारो, मिकिर और खासी प्रभृति सभ्य लोग वनसें लाख, मोम, तन्तु, गोंद वगैरह एकट्ठा कर अपनी जीविका चलाते हैं।उत्तराञ्चलमें भूटान पहाड़के पास गोचारणका बड़ा मैदान है। यहां नानाविध वृक्ष उपजते हैं। जीवजन्तु, पती, गैंडा, नानाजातीय ब्यान, महिष, हरिण, वन्य शूकर, नाना प्रकार सर्प और नानाप्रकार पक्षी देख पड़ते हैं। मत्य भी यहां नाना प्रकार होते हैं। उनमें रेह, चित्ती और पवी नामक मन्य ही पधिक है। यहक योगिनौतन चकवादिका उझेख मिलता है। यषा,- "श दीफलविश्वानि बदरामलकानि च । खन र पनसव तथा तालफलानि च । दाहिम कदली- लकुछ मधुकं युक्त' कथा पूगफलामि। यस्य फलं विशालच तस्य शार्क प्ररोहकम् । बास्नूकस्य च माकच पावास्य मम प्रिये । विलयानि प्रियायन्यान् तथा च सिन्तिडीफल कुष्माकं पायवीय तथा चारयसभवम् । कदलं यौणपूरच रामद पौवकन्तथा । सौमधान्य दान्य रखमालिकमेव च । राजधान्य पष्टिकव देववहमन्तथा। चवर्क कोद्रपद...... चार पचौरच पच माविषोडवम्।" मार प्रत्यामि बन्यानां चामवाशिनाम् । |
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४३०
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कामरूप