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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४४३

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कामरूप

करतोयानदी थावत् करिषाति महद्रयम् ।

दशा तन संस्खाय यास्यन्ति पुनरालयम् ।

सती विमो स्पो मला कामपनिवासिनः।

करिषाति मनान देवी नपपूजादितत्परान् ।

एवं वर्ष वये राज्य कला को हिलो नृपः।

भविषावि महामायै योनिमणयसविधौ।

ततो दादगदले नाभिः कल्पते पूर्वभूमिपः ।

ईथानीमागतः कामामेकछव' करिपाति।।

नद्रामा सकलं दैविधा पावयिषाति।

तत्पी ग्यामवर्णा स्यात् सदाराधितपाती।

सवितं सनयं साध्वी राजान राजपुतकम्।

तजन्मदिवसाई वि यावत् स्यादवादगदिनम् ।

यावत् स्पांचल स्पर्णमपिराविमविष्यति ।

तमेव धनिमः सर्वे कामरूपमिवासिनः।

भविषान्ति सटव स्थान वशिष्ठशापमोचनम् ॥"

(योगिनौतन्त्र, १९ पटल)

किसी समय कामरूपराज (नरक ) मन्दबुद्धि होगे। उसी समय उनका रान्ध मिट जावेगा। तदवधि कामरूपमें ब्रह्मयाप होनेसे नियत दुर्व्यवहार और युद्धादि बढ़ेगा। फिर देवदानव गन्धर्व प्रभृति भी पीड़ादायक बन जावेंगे।

१३११ शक( ? )में सौमारों, कुवाचों और यवनोंका विपुल युद्ध उपस्थित होगा। इस युद्दमें मकारादि कुवाच जय पा एक वर्ष राज्यशासन करेंगे, फिर १३१४ शक( ? )में सौमार कामरूप पधिकार कर बारह वर्ष राज्य चन्नावेंगे। इसी प्रकार शाप- कालके मध्य यवन, * कुवाच, सौमार + और प्लव थासनकर्ता बनेंगे । एतव्यतीत दूसरे भी कई लक्षणादि सङ्घटित होंगे। वशिष्ठ ऋषिका तपीदावानन शान्त होने पर्वत पर यास

⁠योगिनीतबमैं यवम चौर भवनातिको उत्पतिक सम्बन्ध पर इस प्रकार लिखा है,-"कोरवयुद्ध शायपुर बाटोकोके मरनेसे उनका वंश बिलकुल मिट गया। उसी समय कोमि नायौ कोई वाडौकरमकी विश्वनाथ मुक्तिमपमै म विश्वेशरको तपस्या करती थीं। बलिपुव . वाणासुर उस समय महाकाल पसे हारोंको रक्षा करते थे। वर कौमिका सौन्दर्य देख, काममुग्ध हुये। फिर सोमे उनसे सा किया फिर उससे परिन्दम नामक, पापाचारी एव पुत्र उत्पन्न वा। फिर महादेवने उन्हें शायरामा कामरूप दे 'प्रव' पर्चात लामो का विदा किया था। इससे वह मामसे मिश्तिये।

वृक्ष उपनेंगे। उसी समय शिखाके पात कामाख्याका मठ टूट जावेगा। फिर ब्रह्मपुत्रका सङ्गम होनेसे उर्वशीको जलधारा घटेगी। इस घटनादिके पीछे मोक्षह वर्ष बीतने पर १११ शक(?)में सौमार और कामपीठमें एक युद्ध होगा। छह मास 8. स्थानमें युद्ध होने के पीछे समस्त योहा उत्तराकाचकोषमै पहुंच भयहर संग्राम करेंगे। इस युद्दमें कुवाच, यवन और चान्द्र विविध म्लेच्छ सैन्यमें बहुसंख्यक सैन्य तथा प्रख गमादि मरनेसे युद्धस्थल रत प्लावित हो जायेगा। दिगम्बरो मुण्डमाला विभूषिता

वेतायुगमैं बाहनामक धर्मपरायण एक राजा थे। उन्होंने समदीपक मध्य समस्त पिठमव चौकीरा समग्र प्रथिवीम एकाधिपत्य स्थापित किया। दुर्भाग्यवश इस कार्य करने से सनक सनम पाडार उपस्थित वा पौर उसी पपराध परराजलभोने हम्हें छोड़ दिया। फिरीय और तालबार- दो रामायने सन्दरा राज्य अधिकार किया था। वा सपरिवार वनकी भाग थो दिन पौ? मर गये। मामसे उनके पुव सगरने वयामाप्त पिवयव ध्य पोर वाहन पर पाकमण किया। उन्होंने हार मान वशिष्ठवा' पात्रय दिया था। सगर मी वशिष्ठके निकट मांकर पोख,-'इम इन दोनों पिशव वॉक भिरकाटने की प्रतिज्ञा की है। उधर पाप पात्रय दै इन्हें मारनेसे रोकते। समय कार्य इमकी पालनीय। मुतरी बतला- इये-हम क्या करें। वशिहने कहा, 'भास्त्रमै शिरच्छेद और शिरोमण्डन एकरूप माना गया है। पतएव पाप इनको शिर मुंडवा' देशसे भगा दो। इससे उमय दिक् रथा होगी।' सगरने वशिष्ठ वाक्यानुसार एमको मतक मुडम करा निकाला था। पिर वह सुपेक्ष सनिक निकट पर उनके उपदेशानुसार तपस्या करने बने। किन्तु उस समय वह अत्यन्त मंकाचार बन गये चोर दवधि यवन भामसे ख्यात हुये। फिर मी उन्होंने तपोबलसे महादेवको रिमाया पौर कलियुगमें रामा होने का वर पाश । (योमिमौवन्न, ६ पटल)

⁠किसी समय इन्द्र कौशाहक साथ मृत्यगीत दर्शन करते थे। उस समय नबियोंके मध्य कादती नाघी पसराका हावभाव देख कौशाहीका मन विचवित पवा। सीसे इन्द्रने समानको होमेका अभिशाप दिया था। बाडवो यथासमय. कौरववध पा कर ग्यौं । फिर करवमै नब शत शत कोरवरमयी प्रावस्याग करने वौ, वह चन्दचड़ पर्वतके पति सच शिखर पर चढ़ गयो। नहीं उन्हें मृतुकाल या था। इससे वह अपना कामपोषित यौ। उसो समय एने उस पथरी नाते जाते देख सनसे सम्भोग-विया था। उससे मारनामक महामवाली एक पूर्व उत्पन्न हुवा। रुद्रके अनुप्रासे सब बामपका राजा बन गया। परिहमके . ही बमवर सौमार नाम प्रसिद्ध ।(योगिनीता, १५ पटस)