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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४८१

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कायदा-कायव्यह

कायदा (अं० पु.) १ नियम, तरीका । २ रीति,

दस्तुर। ३ व्यवस्था, कानन ।

कायफर (हिं.) कायफल देखो।

कायफल (सं० ली. ) कट्फल, एक पेड़। इसकी छाल पौषध पड़ती है। हिमालयकै उष्णप्रधान स्थानमें यह उत्पन्न होता है। आसामके खासिया पर्वत और ब्रह्मदेशमें भी इसकी उपज है।

कायबन्धन (सं० लो० ) कार्य बनाति, काय-बन्ध ल्यु परिकर, कमरबन्द।

कायम (१० वि० ) १ स्थित, ठहरा हुवा। २ स्थापित, रखा हुवा। ३ निवित, ठहराया हुवा । ४ समान, बराबर।

कायम-कायम खान्का उपनाम । टोंकवाले नवाब वजीर मुहम्मद ख़ानके अधीन यह सेनानीके पद पर प्रतिष्ठित रहे। १६५३ ई० को इन्होंने उर्दू में एक दोषान् बनाया था।

कायमज-फरुखाबादवाले नवाव मुहम्मद खान बहुपके पुत्र । जून मासमें इन्हें अपने पिताका उत्तराधिकार मिला था। इन्होंने वजीर नवाब सफदर जङ्गको प्रेरणा पर रुहेलोसे युद्ध ठाना। किन्तु पराजय होनेपर १७४८ ई० के नवम्बर मासमे उन्होंने इन्हें मार डाला था। फिर वनीर इनका राज्य दवा बैठे। इनके प्रधान.कर्मचारी इलाहावादको बन्दी बनाकर भेजे गये। किन्तु इनकी माताको १२ छोटे जिनके साथ फरुखाबाद नगर वंशके भरणपोषणके लिये मिला था। विमित देश वनौरके प्रतिनिधि राजा नवल रायके संरचण्में रहा। थोड़े दिन पछि ही इनके माता अहमद खान्ने युरमें राजा नवल रायको मार, देश पर अपना अधिकार जमा लिया था।

कायमनोवाक्य (सं० वि०) काय: मनः वाक्यच्च यत्र, बहुव्री०५ शरीर, मन और वाक्यसे होनेवाला, जो दिलोजान से लगने पर बनता हो।

कायममुकाम. (अ.वि.) स्थानापन, एवजी, जगह पर रहनेवाला।

कायमान (सं० को०) कायस्य मानमिव मानमस्त्र,

मध्यपदन्तो। १ टएकुटोर, २ देहपरिमाण, जिस्मकी नाप ।

कायर (हिं.) कासर देखो।

कायरता (हिं०) कातरता देखो।

कायरूपसयम (सं० पु०) पातघ्नल कधित एक ध्यान। इसमें अपने रूपका संयम कहा है।

कायल ( अ० वि० ) यथार्थताको स्वीकार करनेवाला, जो ठ निकलने पर अपनी बात पकड़सा.न हो।

कायली (हिं. स्त्री०) १ ग्लानि, शर्म। २ मघानी । कायवलन (सं० लो०) कायो धल्यते पाच्छाद्यते अनेन, काय-बल-ल्युटा कवच, बखर।

कायव्य (संलो०) महाभारताच एक दमनराज । इनके जन्मका विवरण इस प्रकार दिया है, किसी निषादीक गर्भ और क्षत्रियके औरससे कायष्यका जन्म हुवा। यह दस्युदशाधिप बनते भी सर्वदा धर्म-कर्ममें लगे रहते थे। अनुचरोंके प्रति इनका आदेश रहा-तुम लोग वामए, सपखौ, भीक, शिश, स्त्री और युद्धसे भागे व्यक्तिको कभी मत मारो। या स्वयं वनवासी, तपखो तथा ब्राह्मणको पूजते और मृगादि मार उन्हें पर्याप्त पाहार देते थे। इसी प्रकार दस्युत्ति रखते भी कायष्यने सिद्धि पायो। (महामारत, शान्ति, १२५ १०).

कायव्यूह (सं० पु.) काये धरौरे व्यूहः वातादीनां बगादीनां सप्तधातूनाञ्च व्यूहनम्, तत् । शरीरक वात, पित्त, नमा, त्वक् प्रभृति सप्तधातुका विन्यास, वाह्यदिकसे पारम्भ करने पर यथाक्रम लक, रक्त, मांस, सायु, अस्थि, मन्ना और शुक्र पाते हैं। वात, पित्त और मा शरीरके अभ्यन्तरमें पृथक् पृथक स्थामपर अवस्थित हैं।

इन तीनों दोषों की अविकृत अवस्थाका स्थान इस प्रकार निर्टिष्ट है, नितम्ब एवं गुदेश वायुका, और पक्वाथय (तिनम्ब एवं गुपदेशके ऊपर नाभिके नीचे पक्वाशय पड़ता है) तथा भामाशयके मध्य पित्तका और भामाशय भाका स्थान है। संक्षेपमें प्राधान्यके अनुसार उन्म तीनों स्थान सीमों दायों के समझे गये हैं। (सयत )

प्रत्येक दोष पांच पांच भागों विभक्त है। सस