पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/२२९

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लाताद्वीप दृध ४ सेर, सैरका काढा १६ सेर, फलकार्थ-लोध, -ाय : वित्रा (आवादी नहीं है) फल, मजीट, पद्मकेशर, पद्मकाप्ट, रकचन्दन, उत्पल, फोसनर दीपावाली- यष्टिमधु प्रत्येक १ पल । इस तेलकी कुल्ली करनेसे दालन, अगत्ति १३७५ दलचाल, दन्तमोक्ष, कपालिका, गीताद. मुखदौर्गन्ध्य, । पचरत्ति २१२६ अरुचि और मुसकी विरसता नष्ट होती और सब दन्त अन्द्रोथ २८८४ मजबूत होते हैं। कालपेणी १२२२ लाक्षाद्वीप-दक्षिण-भारतके मलबार उपकृल के निकट एफ मिनिकोई (मीनकर) २१६१ द्वीप। यह अक्षा० १० से १४ उ० तथा देशा० ७१४० सुहेली (आयादी नहों) से ७४ पू० के मध्य भारत-महासागरम अवस्थित है । यह ! मिनिकोई ठोपके अधिवासी लामाहोपर्क वासियोंकी भारत उपकूलसे प्रायः २०० मील पड़ता है। चौदह तरह मलयालम भाषा नहीं बोलने । इनरी कथित भापामें ढोपोंको ले कर यह दीपपुञ्ज बना है। इसके नी द्वीपोंमें | लाक्षाहोपी भाषा को बहुत कुछ पृथकता और मालद्वीप- लोग वास करते हैं। इसका उत्तरांग दक्षिण कनाडाके चासोको भाषाकै साथ बहुत मदरता देय कर इस द्वीप कलकरके अधीन तथा अवशिष्ट दक्षिण भाग कोन्ननरके: को मालहीपपुत के अन्तर्गत किया जाता है। । अली राजाके शासनाधीन है। यह मलयार जिलेका एक इसका प्रत्येक द्वीप प्रवालसमष्टिके संयोगले उत्पन्न अंश माना जाता है। है। सब समुद्रको तइसे १० या १५ फुट ऊंचा और ___ यहां एकत्र बहुन द्वीप रहनेके कारण लक्षद्वीप शब्दसे भू परिमाण २ से ३ वर्गमील है। इसके चारों ओर लाक्षाद्वीप शब्दकी उत्पत्ति हुई है। शायद एक समय प्रचालन पर्वतशिविर दिखाई पड़ता है। पूर्वा का प्रवाल. मालद्वीप और लाक्षाद्वीप एक श्रेणीवद्ध हुआ हो। उम गिरि पश्चिमसे कुछ कम है। पश्चिमकी ओर वह ५०० समय लोगोंने छोटा छोटा लक्षद्वीप देस पर उसका नाम गज और कोई कोई पौन मोल तक विस्तृत है। लामाद्वीप रखा। फिर वहुतोंका कहना है, कि प्रवाल. यहाक कम गहराईके गड्ढेका जल 'रेगुण'की तरह समष्टियोगसे इस द्वीपको उत्पत्ति हुई है। प्रवाल और स्थिर है। यहा तक, कि मीषण तूफानके समय उसी लाक्षा एक-सी होती है इस कारण लोग इस लाक्षाहीप जलमें निर्भयसे नारियलका छिलका भिगोया जा सकता कद्द कर पुकारते हैं । अधिक सम्भव है, कि अरवी वणिक् है। दह जानेका कोई भय नहीं रहना । ज्वारके समय वह बहुत दिनोंसे लाक्षाका वाणिज्य करनेके लिये मलवार स्थिर माग जन्नपूर्ण रहता है, भाटा पड़ने पर गड्ढे के उपकूल जाते आते होंगे। उन्होंने ही लाक्षासे इस द्वीपका वाचले जल बह जाता है। उस समय उसका ऊपरी लाक्षाहीप नाम रखा। १५१६ ई०मे वार्यासा लाक्षा भाग सूग्बा दिखाई देता तथा उसी नली गा खात हो कर होपको मलनहोप और मालद्वीपको पलनद्वीप घोषित कर देशो नावे चल कर लेगुनके बंदर में जहां अधिक जल गये हैं। तुहफन्-उल-मजाहिदीन प्रन्यमे यह मलवार रहता है वहीं हर आती हैं। उक्त द्वीपोंके पश्चिम- द्वीपपुञ्ज कह कर वर्णित है। नीचे वर्तमान द्वीपपुओंके मे जैसा प्रशस्त प्रचालन गिरि है, वैसा पूर्वमे नाम दिये जाते है,- नही है। उस ओर उच्च पर्वत पदम समुद्र- के गर्ममें मिल गया है। भूतत्त्वको आलोचना. दक्षिण कनाडा लोकसंख्या से मालूम होता है, कि पश्चिमकी अपेक्षा पूर्व यामीनि या आमीनदीवि २०६० दिशा बहुत पहले गठित हुई है। इस द्वीपपुरके चेतलात प्रत्येक ऊपरी भागमें चूनापत्थर या प्रवालज स्तर दिखाई २४५ देता है। उसके ऊपर कभी भी जल नहीं चढता। यह क्लितान ७६० | स्तर एक डेढ़ फुट मोटा है। इसको खोदनेसे नोचे बलुई ५७७