पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/३६८

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लोकाभ्युदय-लोक पणा ३७३ रोकाम्युदय (म पु०) लोग्स्य अभ्युदय । लोक्समूह। दूर जाने नही पाती । ऋषिगण इस लोकालोक्का का अभ्युदय, जनताको उनति । परिमाण पचाम कोटि यो नन इस भूमएडल्या चतुर्था श लोकायत (स.हो०) रोपपु आयत विस्तोणमिय।) वतलाते हैं। आत्मयोनि ब्रह्माने इम पर्वतके ऊपर चारी १ चा कमात्र। इस दशनमें परलो या परीक्षवादका | योर ऋपभ पुष्पचूड, वामन और अपराजित नाम चार खएडन है। २ वह मर जो इस लोक अतिरिक्त दिगगन स्थापन वि हैं। ये सब दिग्गज सारे ससार दूसरे लोक्को न मानता हो। ३मिसा फिसीक मतसे कारक्षा परते हैं। भगवान् हरि इस स्थानमें ममी दुर्मिल नामद छन्दका एक नाम । गौमा भाइके रिये जाशमम्भून दिक्पालाक बीर्य लोकायतन (सपु०) १ चावाल । २ नो चावाकर मत्वगुण और ऐश्वर्यकी वृद्धि कर विप्वकमेनादि अनु नास्तिक मत अनुसरण करता हो। घरोंके साथ चतुभुज मूर्तिमें विराजित हैं। सनातन लोकायतिक (स० पु०) लोकायत शास्त्रमस्त्यस्येति, विष्णु अपने मायारचित विश्वका रक्षाके लिये कल्पान्त लोकायत उन् । १ चावा २ धौद्धभेद। ये लोग काल तक इस मूर्ति अवस्थान करने हैं। नास्तिक लोकायतके मतानुसार चाते हैं, इसीसे इनका (देवीभाग० ८।१४ म.) लोकायतित नाम पड़ा है। रोकायेक्षण (स की०) नगत्को मलाई चाहना। लोकायन (स.पु०) नारायण। लोकिन् ( स० वि०) १ रोप्राप्त, स्वर्गीय। (पु.) रोकारोक (स० पु०) लोक्यतेऽसौ इति लोक न लोक्यते | २ लोकपति १३ जगद्वासिमान। इस अयम पयल बहु ऽसौ इति बारीक तत कर्मधारय । स्वनामस्यात परत | वचनका ही प्रयोग हाता है। विशेष । पर्याय-चनमाइ। यह पयत साधिद्वीपा लोक्श (स.पु.) लोकानामा । १ ब्रह्मा । २ वुद्धमेद । पृथिवीको वेटन पर प्राकारको तरह घटा है । इम पवत ३पारद, पारा। ४ । ५लापार । ६ लोकाधि + शिसी स्थानम सूर्यालो दिसाइ देता है और किसी पति। स्थानमें नहीं दिखाई देता है। इसलिये इसका लोकारोवेशकर-तत्त्वदापिका वा तत्त्ववोधिनी नामक रामा लोग नाम पड़ा है। श्रमकृत विद्वान्तचद्रिकाको राका रचयिता। इनके इस पयता विपप देवीभागवतमें इस प्रकार रिमा पिताका नाम क्षेमटर था। है-भगवान्ने भारदसे कहा था, 'नारदा शुद्ध सागरक घर रोक्शनभगाप्यय (10 त्रि.) पाल्गणसे उद्भूत पर रोकालोक नामक पर्वत है। यह पर्वत रोक (का7 | मोर उसासे प्रतिनिहत्ता मान ) और अलोर (अप्रकाशमान ) इन दो स्थानों के विमागके लिये कल्पित हुआ है इस कारण इसकालोका लोवर (स० पु०) रोकानामीश्वर । १ युद्धदेव । लोक राम पड़ा है। मानसोत्तर और मेरु दोनोंके मध्य २लोक्का प्रभु । ३लोक्पाल । यत्ता समस्त भूभाग सुरपामय और दर्पणवा तरह निमल लोकेश्वरत्मिना (० सा० ) 1कश्वरस्य उदस्य मार है । यहा देवताको छोड़ और पाद पाणी नहीं रहता। जे। बुदशक्ति भेद । पर्याय-तारा महाश्री, मोहार यहा जो उ वस्तु रखो जाती है, यह सोना हा नाती/ स्वाहा, श्री, मनोरमा, तारिणो, जपा, मन ता, शिवा है। यही कारण है कि यहा को नहीं पाता। परमेश्वर खदुरवासिना, भद्रा वैश्या नौलमरस्वती, शादिनी उस परतको तान के सीमास्थान रखा है। सूर्य महातारा, वसुधारा, धनन्ददा, विलोचना लोचना । प्रभृति ध्रयापधि ज्योतिष्मान ग्रहोंगे रिण उसा लोकटि (सयो०) इटिम द। अधीन तोनों सा नाती है। कभी भी उसे लोवधु ( स० पु०) लोकाना पा एव पधु । छोड़ कर बाहर नहीं निर साना । यह परत गौतम बुद्ध या शाक्यमुनि । इतना था और विस्तृत है, कि महोको गति उननी | लोपेपणा (स. स्ना०) १ खगप्रालिका इच्छा, स्वग सुख Tolxx