पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/४३७

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४४२ वगेसर-वर्धन में कम्पल्य तालुकके अंदर एक गण्डनाम। यह अक्षा० . चालित होता है। भू-परिमाण ३६ वर्गमील है। इस १३४७ १५” उ० तथा देशा० ७७५०३१“पू० तक | राज्यमें लगभग १७८ गांव लगते हैं। राज्यका मध्यस्थ विस्तृत है। यहां विचार-सदर स्थापित है। अक्षा० -३० ५५ उ० तथा देशा० ७७७ पृ० तक वगेसर (वसर )-युक्तप्रदेशले कुमायू जिलान्तर्गत एक | विस्तृत है। नगर। यह अक्षा० २६ ४६२० उ० तथा देशा० ७०। यहांके मरदार राना दलीप सिंह (१८८५१०) ४७ ३५ पू०के बीच सरयू और गोमती नदीके संगम | | राजवंशीय थे। १८५६ ई०मे उनका जन्म हुआ था। चे पर अवस्थित है। कलकत्तेसे यह स्थान १११ मोल, अगरेज-राजको धार्पिक दो हजार रुपये कर देने थे, किन्तु उत्तर-पश्चिम तथा अलमोरासे २७ मील उत्तर-पूर्व पडता| कालका यौर सिमलाके मध्यवनों कसीलो और सोलान है। नगर समुद्रकी तहसे प्रायः तीन हजार फुट ऊंचा सेनानिवासके लिये यद्गरेज-गवर्नमेण्टने उनसे लिया था है। इस नगरके साथ मध्य एशिया और तिब्बतका विस्तृत जिससे फरमें १३६) रुपये कम कर दिये गये हैं। बाघल. वाणिज्य है। प्रति वर्ष माघ महीने में यहां भूटिया जाति राज्यको भांति यहांके सरदारगण भी थट्रेज-गवर्न- का एक मेला लगता है। मेण्टके साथ मन्धिसूत्र में आवद्ध हैं। यानेज देसी। कहते हैं, कि मुगल-साम्राट् तैमूरने पहले वगेसर उप- वधार (वधियाड)-सिन्धुनदकी एक शाम्रा। यह त्याभूमिमें एक मुगल-उपनिवेश स्थापन किया था , करांची जिलेके ठाठा नगरके दक्षिण में अक्षा० २४४० 'किन्तु आज कल वह मुगल-जातिके वासका चिह्नमात्र ३० सिन्धुगावसे निकल कर समुद्र की ओर बह गई है। है। केवल पहाड़ी वनिये लोग व्यापार करते हैं। १८वीं सदीमें यह नदी बहुत विस्तृत और वेगवती थी। वगैरद्ध ( अ० अध्य० ) एक प्रत्यय जिसका अर्थ यह होता | लाहोरी बन्दरफे सभी पण्यदय्य उस ममय परिचालित है कि "इसी प्रकार और भी समझिये" इत्यादि, यादि । हो फर समुद्र के किनारे लाये जाते थे। .१८४० ई०में इसका प्रयाग वस्तुओंको गिनानेमें उनके नामों के अन्तमें दालका चर पड जानेसे सिन्धुकी गति बदल गई है तथा संक्षेप या लाघबके लिये होता है। वह नदीवक्ष धीरे धीरे सूखता जा रहा है। इस नदीके चगोर-राजपूताने उदयपुर जिलान्तर्गत एक नगर । यह मुहाने पर अवस्थित पिति, पितियानी, जूना और रेलाल उदयपुर राजधानोसे ६७ मील उत्तर पूर्व पड़ता है। शाम्बामें आज भी नाव- द्वारा गमनागमन किया जाता है। पहले यह महाराना सोहनसिंहकी जमीदारीमें था। वघेल-राजपूत जातिको एक शाखा। आदि शोलदो वा १८७५ ई०में यह उनके हाथसे छीन लिया है। . । चौलुफ्य श्रेणीसे यह शापा उत्पन्न हुई है। रेवापति महा चग्नु (स० पु०) वक्ति इति । वच् (वर्गश्च । उष्ण ३३३ ) | राज रघुराजसिंह-रचित भक्तमाल नामक ग्रन्थमें इस इति नुः गश्चान्तादेशः । १ वक्ता, कथक । २ वावदूक, राजपूत शाखाका संक्षिप्त इतिहास लिखा है-उमसे चकवादी, वहुत चकनेवाला। ३ पशुओंका चीत्कार । जाना जाता है, कि प्रसिद्ध साधु कवीर पश्चिम समुद्रमें ४ भेकरव, मेढ़कका बोलना। स्नान करने लिये गुजरात गये। इस समय चौलुक्य वा चग्वन ( स० त्रि०) प्रियवाफ्य-कथनशील, मीठी वात सोलनीदेव गुजरातके सिंहासन पर अधिष्ठित थे। करनेवाला । (ऋक् १०।३२।२ ) राजाके कोई सन्तान न थी। उन्होंने कवीरसे पुनके लिये चग्वनु (सं० पु०) शब्द। प्रार्थना की। कबीरके आशीर्वादसे मोलोराजके दो वधा ( स० स्त्री० ) पतनविशेप, एक प्रकारका पतग जो पुत्र हुए जिनमेंसे एकका आकार ध्यानके जैसा था। इस टिड्डोके समान होता है। घ्यावाकार पुत्रका नाम घ्यावदेव रखा गया। राजपुरोहितों. वघात-पक्षायप्रदेशके अन्तभुक्त एक पानतीय सामन्त-ने उस दुर्लक्षण पुत्रको समुद्र में फेंक देनेकी सलाह दी। राज्य। यह सिमला-शैलवासके पामि अवस्थित है। राजाने भो समुहमें फेंक देनेका हुकुम दे दिया। कवीरको तथा अम्बाला विभागके कमिश्नरकी देख-रेसमें परि । यह वात मालूम हो गई। उन्होंने कुमारको लौटा लाने