पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/५८५

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वमन बघा चभिर गाज्यों ने उनकी ही नकल पर मसन्टिन तैयार क्येि वस्त्र वुननेकी विस्तृत आढ़ते हैं। काशी में रेशमी तथा जाने पर भारतवर्षमे भेजे जाने हैं। असलो 'डाका | कपासके तंतु पर जरोका काम की हुई फलदार वा मनलिन बहुन स्मिती होना था. धनिकोंके सिवा कोई गुलवहार साडी तैयार होती है। वर्तमान ढाका शहर में उसे नहीं खरीद मक्ता था। सुना जाता है, कि तुर्की भी एकमात्र सूक्ष्म पास वस्त्र तथा नाना प्रकारके नीलाम्बरी कपड़े के ऊपर जरोके फूलदार पाडके कपडे सुल्तान'डोका ममलिन' को हो पगड़ी पहनते थे। तैयार होते है। ढाका सूक्ष्म मसलिनके नतुको पर्यवेक्षण करके | इनके अतिरिक्त मन्द्राज तथा वम्बई प्रेसिडेन्सीके पाश्चात्य पण्डित लोग नाना प्रकारके मत प्रकाश करते | | कई स्थानोंमें वसवयनके बड़े बड़े कारखाने है। गुज- है। उनकी आलोचना करनेने हम लोग आसानोले ! रान अह्मदाबाद, सूरत तथा भरोंचमे नाना प्रकारको प्राचीन बोंगी सूक्ष्मता तथा उस समयके कारीगरों को ! | छोटी माड़ियां तैयार होती है। रंगपुरमें लाल तथा कार्यनिपुणताका परिचय पा मक्ते हैं । मि० टेलर लिग्वते । " काले तुस पक प्रकारका सुन्दर छीट तैयार किया जाता है, कि ढानेके कारीगर पूरे यत्तसे चों को कात कर खाका रात कर। है, उसमें नाना प्रकारके पौराणिक चित्र देखे जाते हैं। , जो बारीक तंतु तैयार करते थे, उसका ॥ छटो वजन- . | पृना, येवकला, नासिक तथा धारवार में नाना प्रकारको का एक पोला नतु लम्बा करनेसे १५० मीलकी दूरी तक रगोन ततुकी साडियां तैयार होती हैं जो महाराष्ट्रकी रम- चाला जा सकता था। स्वाभाविक शीन नथा जलीयवापर- णिों के लिये बडे आदरकी चाजे है। नन्दैर, मुटकल, प्रधान न्यानो में कपासका तंतु कातनेसे शोन बढ़ता है, धनवरम् , अमरचिन्ता तथा अरनी में आज भी ढाकाके ऐसा २६ कर ढाका तांती लोग सुबहके समय नू यो- समान ही मसलिन तैयार किये जाने हैं। वनारसी साड़ी दयो पदले ही चर्चा काना करते थे। जिस समय वायु धोती, कि खाब प्रभृति कपड़ों के समान पैठान, वुर्हानपुर अपेक्षाकृत शुरु हो जाती थी उस समय वे लोग चर्चेके नीचे जल रख कर कार्य करते थे। उससे वायु जलसिक्त नारायणपेट, धनवरम्, येवला प्रभृति स्थानों में भी पडे तैयार किये जाते हैं । काश्मीर, नूरपुर, लुधियाना, हो कर के अशको नर्म कर देती थी। इसके बाद प्रातःकालने ले कर वा १० बजे तक उनकी स्त्रियां तनु अमृतसर प्रकृति स्थानामें पशमी शाल बुने जाते हैं। रंग कातको थी। सन्ध्याके समय ३ वा ४ बजेसे ले कर पुर, भागलपुर, वाराणसी, आगरा, लखनऊ, बरेलो, फत- मर्यास्त होने आध घण्टा पूर्व पर्यन्त ततु काता जाता हगढ, लाहौर, मुलतान, हिसार प्रभृति स्थानोंमें कपास धा । ३० वाट्सनने ढाकाई, फरासी तथा इङ्गलिश ततु- तथा पशमके कार्पेट तैयार होते हैं । साधारणतः कपास- के कार्पट आकृति तथा वयनप्रक्रियाके भेदसे गलीचा को अच्छी तरह परीक्षा रके लिखा है, कि उन सबों की तथा दुलीचा ( Cotton pile carpet ) के नामसे पुकारे अपेक्षा ढाल-मनलिनके ततुके व्यान कहीं कम होता जाते हैं। पजमी रोये ऊचे होनेसे गलीचा ( Woolen था एवं यूरोपीय तंतुकी अपेक्षा प्रत्येक ढाकाई ततुके रेशे भी नही कम देने जाते थे, किन्तु ढाकाई तंतुके रेशे pile carpet ) कहलाता है ! मछलीपट्टमके छीट, पलम- पोर तथा कार्पेट एवं गोदावरी डेल्टास्थित माधम- का ध्यान रोपाय तंतुकी अपेक्षा बड़ा होता था । इन दो पलम नामक स्थानजात माडापालम आज कल 'वृटिश कारणोंने ही ढाकेके तंतुने सूक्ष्मता तथा दृढतामे अन्यान्य गुडम' रूपमें भारतमें आते हैं। माधवपलममे अब वे सभी देशो के तंतु परास्त किया है। और मी विशेषता कपडे धुने नहीं आते। अङ्ग्रेज वणिक लोग तो इन पह, मिडके रेशे मोटे होनेके कारण पब चर्खे से तराते जानने ढाका नतुमें यूरोपीय ततुओं को वस्त्रोंको इजारे पर लेने के लिये वहां कोठी खोली थी। पीछे उसीका नमूना ले कर अपने देशसे माडापा- अपेक्षा कमी अधिक अमेठन रहना है। बभी भी फरास- लम वस्त्र तैयार करके यहा भेजत है । दुःखका विषय है, अना (इन्दननगर). मिमला (कलकत्ता), दगडी, यगोरक उन्हीं लोगों के जरिये इस स्थानका वस्त्रवाणिज्य लुप्त नान्निपुर, , गधाहापुर प्रभृति स्थानों में कपास- । हो गया है।