पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६२९

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वर्णधर्म १४४ होती है। हीनवर्णने दासादि १५ हीनतर वर्ण पैदा होने हैं, फिर इन १२ संकीर्ण वणों ने ६६ अनुलामजान होने हैं। अगम्यागमनने वर्णमंरकी उत्पत्ति होती है। एवं १६ प्रतिलोमजात, इस तरह १३ प्रकारको बारों वणों ने वदिभूत वर्गों के मध्य सैरन्ध्री तथा मागध चर्णसंकर जानिया उत्पन्न होती हैं। फिर उनके अनुलोम जानिसे राजाओंके प्रसाधन कार्याश एवं उनके पिथ्य यर तथा प्रनिलामको गणना द्वारा मनन्त भेद पैदा हो जाते गण तया रत्वादि द्वारा दासजोवन जातिको सृष्टि है, आतपय इस समुदाय पहले कहे गये १५ मेदोंके होती है। माग जाति का संन्द्र योनिम्न वागुरावन्ध मध्य अन्तर्भाव हो गया है, इसलिये सबकी प्रतिसंध्या जीबी आयोगव जानि उत्पन्न होती है। मागधीसे वैदेह प्रदर्शित नहीं की गई है। स्वेच्छाचरणसे अर्थात् जातिगत द्वारा मकर मैग्यक नामापुत्र पैदा होने है। निपाद कोई नियम न रहने के कारण मनमाना समागम करनेसे जाति मह र अर्थन मह नामक मत्स्पापजोबो नया नौका माधु आदिके द्वारा उत्पन्न वाघ वर्णनकरजाति अपने अपने पजीवी दास सन्तान पैदा करती है और चण्डाल श्वपाक फर्मों के अनुमार जीविका और जाति माम मरती है। ये नामक मृनप अर्थात् श्मशानाधिकारी सन्तान उत्पन्न । लोग चतुप्पथ, शमशान, पर्वत नधा दुसरी दूसरी बनम्प. करता है। मागधी बागुरोपजीवी जर चार पुन पैदा तियोंके निकट वास और नियत रुग्णवर्ण लौसमय अलंकार फरते हैं, मानविकर तथा मास सम्झार ही उनके प्रधान पहा पर अपने धर्म द्वारा अपनी जीविका चलायेगे एवं कार्य होते हैं। इनमें दो मान तथा स्वादुकर कहलाते है, अलंकार तथा गृहोपकरण वन्तु नैयार-करेगे। ये लोग पाकी टोके नाम क्षोद नया सौगन्ध नामसे शशिन है। गो-ब्राह्मणों की सहायता करेंगे, इममें सन्देह नदी । इस तरहसे मांगन जातिको चारों वृत्तियों निहिष्ट की आनृशंम्य, दया, सत्य, क्षमा एवं अपने शरीर द्वारा गई है। आयोगवीन पापीष्ट, वैदेहसे मापापजीवी कर, विपन्नों की रक्षा आदि ही वाहावर्णो की सिद्धिने कारण निपादसे नरयानगामा मद्रनाम एवं चण्डालम वराश्वगन होंगी , नरभ्रेष्ठ! इममें मुझे संशय नहीं । बुद्धिमान भोजी पुजशजाति जन्म प्रण करता हैं, ये लोग मृतको। मनुष्य उपदेशानुनार परिकीर्तित दीनजातिको विये. वस्नग्ने ढक्ते पय भिन्न पात्रमें भोजन करते हैं। निवादी चना फरके पुत्रोत्पादन करें, जिस तरह जलमे तैरनेको से बदह द्वारा क्षुद्र, अन्ध्र तथा मारण्यपशु हि सोपजीवी । इच्छा करनेवाले मनुष्यको प्रान्तर अवसान कर देता है, उस पीमार नामक चर्मकार ये तीन पुत्र पैदा होते हैं। ये तरह नितान्त हीन जातिसे उत्पन्न पुत्रवंशश नाश कर लोग प्रामक बाहर वास करते हैं। निषादीस चर्मकार डालता है। इस संसारमें रमणियों विद्वान् अथवा मूर्ष द्वारा कारावर तथा चएनालसे वेणुथ्यवदागपजीवी व्यक्तिको काम क्रोधके वशीभूत र नितान्त कुपधामें पाडुसौपाक जाति जन्म ग्रहण करती है । वैदेदीसे निपाद! नींच लेती हैं। नारियोंका स्वभाव हो दोपको मान है, द्वारा आहिण्डप. नाम पुत्र पैदा होता है। चण्डाल अतपय विपश्चिन् व्यक्ति खिरों पर अत्यन्त आसक्त नही हरा सौपारसे चण्डालसम व्यवहार-विशिष्ट पुत्र उत्पन्न होते। होता है । नियादी चण्डाल द्वारा वाहावों के बाह युधिष्टिर वोले-पाप योनिज होनवर्ण व्यक्ति जो (कृत श्मशानवासी अन वायी संतान पैदा होती है। आर्य के गृहमें जन्मप्रहण करनेके कारण आर्य रुप हो पिन मातृ व्यनिकम वशनः ये सब संफरजाति उत्पन्न । गया है, किन्तु उत्पत्ति के कारण अना है, उसे हम किस होती है, ये लोग ग्रच्छन्नभावले रहे या प्रकाश्यभावसे, प्रकार पहचान सकेगे? फिन्तु अपने धर द्वारा ही पहचाने जाने है। शास्त्रोंमे । भीमने कहा-अनार्यों के पृथक पृथक् भाव तथा चेष्टा. ब्राह्मणादि चारों वर्गोंज्ञा धम लिया है, दूसरे दूसरे धर्म समन्वित मनुष्यको सकरयोनिज समझना चाहिये पवं हीन जातियों के मध्य क्सिीके धर्म का नियम अथवा उनकं सजनाचरित कर्म द्वारा योनिशुद्धता विज्ञात होगी। इयत्ता नही है । ब्राह्मणादि चारों वर्षों से अनुलोमजात ६ इस मसारमै अनार्याना, अनाचार, क्रूरता तथा निष्कि- एवं चिलामज्ञान ६, ग्रे १२ प्रकारले संकीर्ण वर्ण पैदा ' यात्मना कालुपयोनिज पुरुषमे ही देखी जाती है । संकीर्ण