पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६९६

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वन्नमाचारी २ शृङ्गार । दिनके चौथे दण्ड में श्रीकृष्ण तैल चन्दन यायका अनुष्ठान होता है तथा श्यामसुन्दर सुललित गोप कार द्वारा मुगधित तथा वरनालडारसे विभूषित) लो ठानुरूप कितने ही कौतुक दिखलाये जाते हैं। जगह दो धार देने यैठने है। जगह गायक यादक और नर्सक स्वेच्छानुसार उपस्थित ३ ग्वाला। छठे दण्डम श्रोरया मानो गाय चराने | होकर अपना अपना गुण दिखलाते हुए लोगों को मनो जा रहे हैं ऐसे घेशभूपासे उहे ससाना पडता है। रजन करते हैं तथा दर्शकगण प स तु हो कर उन्हे ___राजभोग। मध्याकालमें श्रीकृष्ण गोष्ठसे मानो। पुरस्कार देने है। कहीं नहीं तृण गृह, वस्त्रगृह और घर लौट कर भोजन कर रहे हैं। ऐसा समझ कर घा पण्यशाला बनाई जाती है। उसम हिंडोल आदि उटका लयके परिचारक घिप्रदफ सामने नाना प्रकारफे मिष्टान्न | कर लोगों को अति आमादित करते है। अपयाप्त फल तथा भयान्य सुखाद्य सामग्री रखते हैं। भोग ममास मूल और नाना प्रकारको मिष्टान माममी परिपारोम होने पर प्रसादी द्रव्य और अन्यान्य साममा उपस्थित से सजी रहती है। दर्शकगण परम कौतुहलाविष्ट हो कर सेवकों के बीच काट देत है। कभी कभी यह प्रसाद धनी हर्षोत्फुल्ल चित्तसे धारी भोर विचरण करत है । असत्य और नो शिष्यके यहा भा भेज दिया जाता है। लोगोका समागम! विचित्र पसन। विचित्र भूषण! ५ उत्थापन ) भोगके पाद विप्रहको निद्रा होता है, विविध कौतुक परमाश्चर्य सुदृश्य व्यापार । यह सब देख पोछे छदएड रहते उहे उठाया जाता है। पर लगाके मानन्दका पारावार नहीं रहता। पदारन ६ भोग । उत्थापनके माघ घण्टा बाद धैकालि भोग में भी चाद याश्विन मास दशमीसे लेकर पूर्णिमा होता है। तक इसका उत्सव होता है । यहा नदीके किनारे पापाण ७ सध्या । सूर्यास्तके समय श्रीकृष्णका सायकालिक | मय एलिम घेदोक ऊपर श्रीकृष्णका रासलीलाका अधि मेषा होती है। इस समय दिनके पहने सभी गलटार फल प्रतिरूप दिखलाया जाता है। उतार कर फिरसे तैल और गघ द्रव्यादि द्वारा मनमवा | चलभाचारो ललाट पर दो ऊर्ध्वपुण्ड ग्वाध पर करनी होती है। नासामूलभ गर्द्धचन्द्राकृति बना कर मिला दत हैं। उन ८ शयन । क्रोव छः दण्ड रात्रिक समय विप्रको दोनों पुण्टके मध्यस्थल में एक लाल गोल तिलक रहता शम्या पर स्थापन फर उन समीपणानीय जल ताम्बूला ६। इस सम्प्रदायक भक्त श्रीवैष्णवाको तरह याहु और धार और अन्यान्य शान्तिहर द्रश्य रराव कर परिचारक पक्षायल पर शड्ड चक्र, गदा और पद्मको प्रतिकृति दयालयका दरवाजा याद कर चले नात हैं। अक्ति करत । कोइ कोइ श्यामपदी नामक पाला इन समी समयों में प्राया पक ही प्रकारको सेवा होतो मिट्टो अथवा कालो धातुसे उल्लिखित गोल तिलक है, जैसे-पुष्प, गध और भोगदान तथा स्तोत्रपाठ गाता है । ये लोग गरेम तुलसीको माला पहनते तथा भीर साष्टाङ्ग प्रणाम | विग्रहसे तथा अन्यान्य मनुष्य हाधर्म तुलसी काठको जपमाला रखते हैं मोर धाकृष्ण' भी इन सर्वाका अनुष्ठान करते है। किन्तु कृष्णस्तोत्र तथा 'जयगोपाल कह कर परस्पर अभिवादन करते। प्राय सेरकगण हा किया करते हैं। नित्यसेपोके अतिरिक्त कुछ मावत्सरिक महोत्सव वल्लभाचार्यने श्रीमद्भागवतकी जो रोका लिसी है, भा हैं। काशीधाममें और पश्चिम प्रदेशीय अन्यान्य| यह इन लोगोंका प्रधान साम्प्रदायिक Rथ है। उसमें स्थानों में जन्माष्टमी और रासयानाके उत्सवमें बहुत भागरतको फैसो व्याख्या है, उसीका अपलम्बन कर पे आमोद प्रमोद होता है। प्रामसन्निहित क्सिी चत्वरमें | लोग चलते हैं । इसक सिवा घे ब्रह्मसूत्रभाष्य, सिद्धान बडो धूमधामसे रासयात्रा बनाई जाती है। किसने मनुष्य रहस्य भागरतलोलारहस्य, एका तरहस्य आदि सफेद पोत, लोहिनानि उत्कट वस्त्र पहन कर रासभूमि अनेक सस्थत प्राथ भो रब गये ह । पलभाचाय देय।। में कहे होते हैं, कितने प्रकारका मनोहर नृत्य, गीत और इमक गतिरिक्त सामाप सेयोंक मध्य भी कृष्ण