पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष विंशति भाग.djvu/६९७

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७१२ चलमाचारी लीला प्रतिपादक भाषामे लिम्वित वहुतों सम्प्रदायिक । श्रीकृष्ण के प्रसाद और आविर्भावस्चक भनेक अलौकिक ग्रन्थ प्रचलित हैं। यथा,- | और असम्भावित उपाख्यान सन्निवेशित हुए हैं । विपद-यह प्रन्थ भाषा में लिखा है। वलभाचार्य उक्त अन्धके अन्तर्गत एक राजपुतानी वा राजपुत्र. इसके रचयिता हैं। इसमें विष्णुगुण प्रतिपादक क्तिने जानीय स्त्रियोंका उपाख्यान पढ़नेसे मालूम होता है, कि पद हैं। इस सम्प्रदायमे सहमरणका विधान न था । जगन्नाथ और __ व्रजविलास-ब्रजवासीदासने इस प्रन्थको भाषामें ! राणायास नामक दो शिष्योंको साथ ले वल्लभाचार्य नदी लिग्बा । इसमे श्रीकृष्णकी वृन्दावनलोलाका वर्णन है। तार्थमें स्नान कर रहे थे। इसी समय वह स्त्री अपने स्वामी अपकाप-उस प्रम वलभाचार्य पर प्रधान के साथ सती होने के लिये वहां उपस्थित हुई। यह देख मिष्योंके उपाख्यान हैं। कर जगन्नाथने राणाव्याससे पूछा, 'स्त्रियों मे सतीत्वधर्म वार्ता-इस भाषा प्रन्यमें वल्लभाचार्य और उनके दिखलानेकी जो प्रथा प्रचलित है, उसका या मतलब ?' राणाय्यासने शिर हिला कर कहा, 'सबके साथ सौन्दर्यका मतानुयत्ती ८४ भक्तों अति अद्भुत चारित वणिन है । राण उन ८४ अक्तोंने स्त्री-पुरुष तथा सभी वर्गों के आदमी थे। अनर्थ प्रयोगमान है।" राजपुतानी उनके गिर हिलानेका इस साम्प्रदायिक शास्त्र में जीव और ब्रह्मका अभेद भाव । तात्पर्य समझ कर स्वामीके साथ सती न हुई और घर माफ माफ दिखलाया गया है । सिद्धान्तरहस्यकी । स लौट आई। कुछ दिन बाद उस रातपुतानीको उन दोनों- पगमुक्ति वा जीवब्रह्म-मिलन सम्बन्धीय प्रसङ्ग चौरासी । से अकम्मात मुलाकात हो गई और वह क्यों नहीं सती वार्ता नामक ग्रन्थमे एक जगह ऐसा ही लिावा है।। हुई, इसका कारण उसने कह सुनाया, पीछे स्त्रीने दोनोंसे वल्लभाचार्य श्रीकृष्णके साथ इस विषयमे कथोपकथन प्रार्थना की 'उस दिन आप दोनोंम मेरे ले कर क्या वात- | चीत होती थी, सोरुपया कहिये।' राणाव्यास अच्छी तरह करके इसका मर्म अच्छी तरह समझ गये थे। यथा,- समझ गये, कि इस राजपुतानी पर श्रीमाचार्यकी कृपा ___ "तव श्रीश्राचार्यजी महाप्रभु आप कहैं जो जीवको हुई है। जगन्नाथके साथ उनका जो कथोपकथन हुआ म्वरूप तो तुम जानत ही हों, दोपबन्त है, सो तुम सों था, उसे सुना कर कहा कि, 'अपना रूपलावण्य श्रीठाकुर- सम्बन्ध कैसे होय ? तब श्रीठाकुरजी आप कहे जो तुम जीकी सेवामें समर्पित न करके प्रवके ऊपर जो निक्षिप्त जीवनको ब्रह्मसम्बन्ध करावोगे तिन को हों अतीकार करती रही, वह सचमुच अतिशय अनुचित और अत्यन्त पर गो तुम जीवनको नाम देवगे तिनको सकल दोष दुःस्त्रका विषय था।' अनन्तर राजपुतानोने राणाध्यास. निवर्त होयंगे।" से इस प्रकार उपदिष्ट हो कर श्रीठाकुरजीके परिचर्या अर्थात्-'तब आचार्यने कहा, तुम जीवका स्वभाव कार्य नियुक्त रह अपना जीवन विताया। जानते ही हो, वे सभी दोषी है , नव फिर किस प्रकार ____ वल्लभाचार्यके पुत्र विट्ठलनाथ पितृपद पर अभिषिक्त तुम्हारे साथ उसका संयोग होगा ? इस पर ठाकुरजी हुए। इस सम्प्रदायके लोग उन्हे श्रीगोसाईजी समझते ( अर्थात् श्रीकृष्ण ) ने कहा तुम ब्रह्मके साथ जीवका जो हैं। विट्ठलनाथके सात पुत्र थे,-गिरिराय, गोविन्द ग्मयोग फर दोगे, मैं उसीको स्वीकार कर लूगा।' राय, वालकृष्ण, गोकुलनाथ, रघुनाथ, यदुनाथ और धन इन सबके अलावा और मी तिने साम्प्रदायिक ग्रन्थ श्याम। ये सभी धर्मोपदेशक थे। इनके मतानुवत्तों वद्यमान है, किन्तु उनका वैसा प्रचार नही है। भक्त यद्यपि पृथक पृथक समाजभुक्त हैं, पर प्रधान प्रधान मालमे मी इस सम्प्रदायसंक्रान्त अनेक उपाख्यान हैं, विषयों में प्रायः सभी समाजोंका एक मत है। केवल किन्तु बल्लभाचारी दूसरे दूसरे सम्प्रदायकी तरह इसे मूल शास्त्र नहीं मानने । टल्लिखित चार्ता हो इन लोगों मालूम होता है, फि यह सस्कृत गिरिधारी शब्दका अप का भक्तमाल है। मक्तमालकी तरह इन सब प्रन्योंमें मी | दंश है। -