पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/११७

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पहम्मद शाह तुगलक १५ १०७ . दावा किया । किन्तु सम्राट् इधर-उधर करने लगे। इस उसको हायको लिम्रायट भी इतनी सुन्दर यो, कि जो . बङ्गालमें 'वर्गी'का झगड़ा चल रहा था। देवता उसे तारीफ करनी ही पड़ती थी। इसमें - घर बादशाहको एक नई यिपद्धको सूचना मिली। नपे मारोंका मायिफार किया था। उसके उत्साहसे 'नादिर शाहको मृत्युके पाद महम्मद पां भयदालो अफ। उस समय सब तरहको यिपार्मोको उन्नति हुई थी। गानका नेतृत्य प्रण कर भारत-यिमय फरनेके लिये यह पुनकी तरह प्रजाका पालन करता था, उसके 'चला। सन् १७४७ में यह पावमें माया, यहां मुगल | सामने हिन्दू और मुसलमान दोगों परायर थे। दा. सूर्यदारने अफगान अबदालीका साथ दिया । लाहोर भीर निफनामें उसका मन विभ्यास था। तर्फ भीर मुलतान पर मफगानियों का अधिकार हो गया। मोमांसामें जो यकियक होता था. उसी पर यह ध्यान - . , वादशाहने १२ हजार फौजोंके साथ अपने शाहजादा देता था। मामय उसका हृदय कठोर बन गया। यह . मलादको भेजा । ..महादने सरहिन्दमें पहुंच अपनी इस्लामधर्म में लिने दया भौर विनयका पक्षपाती महो' .. छायमो साल दी। यहां सन् १७४८६ में अफगानियोंके । था। यह जानता था, कि पह सब मसत है। इसी • साथ घोर युद्ध हुमा । माका मदीना था, अफ- कारणसे सविचारयाले मुसलमान उसको हरिम पर . गानियोंने , शाहजादाको घारों' मोरसे घेर लिया। कर शारीरिक दएर पा जाते थे, कमो कमो कत्ल करा किन्तु शाहजादाने अपने कौशलसे अफगानियोंको ऐसो देने में भी यह हिचकता नहीं था। यह यिवारयान था। 'मार मारी, कि उनको भागना ही पड़ा। इस लड़ाई में इससे किसोका मोसो दोष देखता, मह दिना दएड दिपे मफगानियों को कहीं गहरी क्षति हुई थी। इसी समय नहीं छोड़ता था। अपने मघोनके सैयद, स्फो, कमलान- । महम्मद शाह कठिन रोगसे पीड़ित हुए । सन् १७४८ दापसर्फ पा सिपाही समी दरिडत होते थे। किसी पर ६० अप्रिल महोने में सरहिन्दको जोतफे ठोक एक वर्ष भी असहन्त दया नहीं करता था। भोर तो पया, उसको वाद २८ पप सक साम्राज्यका सुसभोग कर उसने अमलदारोमें पेसा कोई दप्ता नहों बीतता था, कि उसका 'इदलीला संघरण कर ली। उसका ज्येष्ठ पुत्र महमद । दरयाजा मुसलमानोंके पूनस सरबतर न मा हो। शाद हो बादशाह हुमा। उसने २७ प तक सो सरहका शासन किया था। महम्मद शाह तुगलक (म तुगलक )-दिल्लीके। इस भवधिमे उसके भत्याचारको बहुतेरो फदानां मुनाई पठानपंशका पक राजा, सुलतान गयासुद्दीन तुगलक देती है। एक समय हुपम न मामने कुमरमें अपने सेना. शाहका पुन । इसका यथार्थ नाम है, मालिक फषकः । पतिका जोता वाल निचया लेनेका दुपम दे दिया था। दोन जूनान । सन् १३२५१०में यह तुगलकाबादमें अपने विद्यादि नाना गुणीसे विभूषित होने पर मो तथा एक • पैतृक सिंहासन पर बैठा भौर "सुलतानुल मुमादिदसाधुचेता मुसलमान, फिर रामा होकर भी उसके इस · मयुल फथ महम्मद शाह इयन सुगलक गाद" नामसे जुल्मको कहानोने उसे बदनाम कर दिया। उसके परिल दिकपात हुआ। ... पर विचार करनेसे मालूम होता है, कि अधिक दार्शनिक 'सस्तनशीनीके ४० दिन बाद यह दिल्ली राज प्रन्धोंके पढ़नेसे उसका दिमाग पराव हो गया था। 'भानीमें माकर पहलेको पुनसान सिंहासन पर सरेको सामोर देग उसको जरा मी दया नदी माही - पुराने राजमहलमें पद रहने लगा। इसने लदा थी। पर यह महा यिदान पा इममें समय नहीं। पनमें कुरा शिक्षा प्राम कर ली थी। साहित्य, इतिहास, इस सरदका अत्याचार सपा पटार गासन करी यिवान दर्शनादिमें भी पूरा दखल देता था। सिपाइसके हुए भी उसने गुनामदेन, रित, गुजरात, माटपा, 'यदपक मया सापर भी था। इसके यहां जो दानिक चटगांव भादिमानों पर अपना कामा प्रसारमा पा। पा पिवान् माता था, वह उसमे अपनेको हार मान कर किन्तु मनमे उमझो मिला तथा गुण गरिमा हो नाता था मौर उसको विनाशी प्रसा. करला उसके जीयननानका कारण बनो । अन्तिम समय