पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/३२०

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पहिपासुरसम्भव--मही विध्यस्त किये गये । अन्तमें महिषासुरने स्वय' विपुल- महिपोतक (सं० क्ली० ) भैसके दूधका महा। गुण- वीर्यको आश्रय कर नाना मायावी मूर्तिसे भीषण लोम-1 कफवर्द्धक, कुछ गाढ़ा तथा प्लीहा, अर्श, ग्रहणोदोप और हर्पण युद्ध आरम्भ कर दिया । कोपारुणनयना देवो अतीसारमें लासदायक। चण्डिकाने महिषासुरफे दौरात्म्यसे तंग तंग आ कर महिपीदधि ( स० लो०) भैसका. दही । गुण-मधुर, . खड गसे उसका शिर काट लिया। दुर्घत्त महिषासुरके | रक्तदोपकर, कफ तथा शोफहर, पित्त और धातवद्धक। मारे जाने पर असुरोंकी सेनामें कुहराम मच गया। देव. महिपोदान (स'. क्लो० ) महिप-बलिदानरूप प्रक्रिया गण बड़े प्रसन्न हुए । सयोंने मिल कर चण्डिकाफी | भेद। पूजा की। | महिपीदुग्ध (स'० क्लो०) भैसका दूध । गुण-स्निग्ध, महिषासुरसम्भव (स'० पु०) भूमिज गुग्गुलु, जमीनसे | वायु, शीतकर, तन्द्रा और निद्राकर, वृष्यतम, श्रमान, बल- उत्पन्न गुग्गुल । . पद और पुष्टिकर। महिषासुरहन्त्री (सस्त्री० ) दुर्गा। महिपोपाल (सं० पु०) महिपोपालनकारी, मैं सको पोसने महिषो (स० स्त्री०) महिपस्य कृताभिपेकस्य नृपस्य | वाला ग्वाला। पत्नो (पुयोगाख्यायो। पा ४३११४८) इति डीप । कृता-महिपोप्रिया ( स. खो०) महिषीणां प्रिया । शलोतुण, । भिषेका राजपती, पटरानो। जिस पतीके साथ राजा अभिशिक्त होते हैं उसीको महिपी कहते हैं। राजाकी महिपोभाव (सं०पु०.) महिप्पाभावः। महिपोका भाव। " शूली नामक घास । । पंतीमाल ही महिपो नहीं कहला सकती। . | महिपिमूत्र (सं० को०) भै सका मूत । गुण-तिता, "इत्य अत' धारयतः प्रजार्थं समं महिध्या महनीयकीतः।। कटु, कपाय, भेदक, यातनाशक, पित्तवरक, कुष्ठ, अर्श, सप्त व्यतीयुत्रिगुणानि तस्य दीनानि दीनोद्धरणोचितस्य ॥" (रघु २२२५) 'पाण्ड. उदररोग और शूलनाशक । २ सैरिन्ध्री । ३ औपधिभेद। ४ महिषपत्नी, मैंस । महिपेश ( स० पु० ) १ महिषासुर । २ यमराज । पर्याय-मन्द्गमना, महाक्षीरा, पयस्विनी, लुलापकान्ता, | महिषोत्सर्ग (सं० पु०) एक प्रकारका यश ।' फलुपा, तुरङ्गतिपणों। इसके दूधका गुण मधुर, पोनेमे महिष्ठ (सं० वि० ) अतिशय महान्, बहुत बड़ा । . . ढदा, गुरु, बल और पुष्टिप्रद, गृप्य, पित्त, दाह । महिष्मत ( स० वि०) १ महिपयुक्त, जिसे भैंस हो । (पु०) . २एक राजा। " और मस्रनाशक ; दधिका गुण मधुर, स्निग्ध, श्लेष्म- महिष्मतो (सं० स्त्रो०) गिराको लड़की । फारक, रकपित्तनाशक, बल और अस्रवर्द्धक, यलकर, | महिप्वनि (स० ति०) प्रभृत धनशालो, यड़ा धनवान् । श्रमन; मक्खनका गुण-कपाय, मधुररस, शीतल, यल- महिप्यत ( स० वि०)१ महनाय. पूजन करने योग्य । कर, पित्तन, स्थौल्यकारक ; धोका गुण धृतिकर, सुखद, २ महोत्सय-युक्त। कान्तियर्द्धक, यातश्लेप्मनाशक, वलकर, वर्णवद्धक, महिमुर-दक्षिणभारतके अन्तर्गत एक प्राचीन हिन्दू-राज्य प्रहणीविकारनाशक, मन्दानलोदीपक, चक्षु का दीप्ति-! 1 और जिला विशेष विवरण मेयर शब्दमें देखो।' .. बर्द्धक तथा मनोहारक। इसके मूत्रका गुण आनाह |मदो (स'... 'महाते इति-मह-मच् ( गौरादिभ्यरन । शोफ, गुल्मदोपनाशक, फटु, उष्ण, कुष्ठ, ." पा : ५ यद्वा मदि कादिकारादिति हो । और उदररोगनाशक माना गया है । ( राजनि०: । यह नदी मालयामें यहती महिपीकन्द (सं० पु०) एक प्रकारका कन्द जिर ... .... पित्तहर और भी कहते हैं। , गाय। ३ महिपोघृत ( सं० ली.) : दुग्धोत्य घृत, घो। गुण-यायु , ,शीतल, म. ८' , है।