पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/४७५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


मानसिंह जव घोडाघाटका शासनको ईशा इस लोकसे चल। प्रधान थे। उनके बाद शाहरुख और आजिजकोका- वसा है, तव फिर अफगान अपना सिर उठा नहों ने उक्त पद प्राप्त किया था। सकता। किन्तु कुछ समय बाद ही उनके पुत्र जगत्। कुछ समय दरबारमें रह कर मानसिंहने फिरसे सिंहकी मृत्यु हो गई जिससे ओसमानके अधीनस्थ बङ्गालको याता कर दी। १६०४ ई० तक उन्होंने राज- पठानोंने फिरसे विद्रोहयहि प्रज्वलित कर दी। इस नोति-कुशलता और न्यायपरताको साथ बङ्गराज्यका 'समय मोहनसिंह और प्रतापसिंह ( आईन-इ-अकबरीमें ! शासन किया था। इस समय समाट अकबर बीमार महासिंह नाम से प्रसिद्ध ) विहार और बङ्गालका शासन : पड़े। मानसिंह राजकार्यसे फुरसत ले कर उनसे मिलने करते थे। यह संवाद पा कर यह दंग रह गये और अपना आगरा गये । सम्राट को ६ सौ हाथी और यहुमूल्य सेनादल ले कर उड़िसाकी ओर चल दिये। भद्रकके अलङ्कारादि उपढीकन देकर वे उनके विशेष सम्मान- 'समीप मुगल और पठानको सेनामें मुठभेड़ हुई। इस भाजन हुए थे। युसमें मुगल लोग परास्त हुए और पाठानोंको बङ्गालका राजा मानसिंह इतने बड़े पदराज्यका स्वेच्छासे अधिकांश स्थान हाथ लगा। । परित्याग कर सम्राटके मृत्युकालमें आगरा क्यों आये ! सम्राटने इस अभावनीय दुर्घटनासे मर्माहत हो शोध' इस वातको हल कर किसी किसी ऐसिहासिकने लिखा ही मानसिंहको बङ्गाल जानेका हुकुम दिया। इस समय , है, कि सम्राट योमारीकी हालतमें राजकार्य नहीं देख राजा मानसिंह अजमीरमें रहते थे। वादशाहका आदेश , सकते थे इस कारण उन्होंने यजीर खां आज़िमके हाथ 'पाते ही घे रोहतस दुर्गको लौटे। सरकार सरीफायादके कुल राज्यभार सौंपा था। जहांगीरको अकवर पहले हीसे 'अन्तर्गत सेरपुर-आटाई नगरके समीप मानसिपके साथ ' नहीं चाहते थे। जहांगीरके खुशा नामका एक लड़का अफगानोंका युद्ध हुआ. इस युद्धमें अफगानोंकी हार, था जो मानसिंहका मांजा होता था। उनका विवाह हुई। पठान-सरदार ओसमान पराभूत सेनादल ले कर प्रधान वजीर खां आजिमको कन्योसे हुआ था । पत्र उड़ोसाको भाग चले । मुगलोंने शत्रुओंका पीछा किया। मानसिंह और आजिम अपने भांजे और जमाईके लिये राहमें उन्होंने मीरयषसो अबदुल रेजाकको हाथोकी पीठ पड़यन्त्र रचने लगे जिससे उसे दिल्लीका सिंहासन लाम पर देख पाया। अबदुल : रेशाफ मुगलकर्मचारी था। हो । राज्यके इन दो प्रधान व्यक्तियोंको पड़यन्तमें लिप्त देस पूर्वयुद्ध में पठानोंने उसे बंदी किया था। इस वार मान शाहजादा जहांगीर पिताके पास गया और फुल हाल उन्हें सिंहको कृपासे उसने छुटकारा पाया। मानसिंह उसे | कह सुनाया । मृत्युशय्याशायी वृद्ध सनार ने उन बहुत चाहते थे। दोनोंको बुलाया और इस अत्याचारके लिये उनकी बढ़ी ___ मानसिंहके इस प्रकार हठात् पहुँच जाने पर पठान , निन्दा की। बादशाहने उन दोनों से कहा, कि 'मेरे मरने लोग पहले ही हताश हो गये। पोछे परास्त होनेसे पर जहाँगोर हो एकमात्र दिलोसिदासनका अधिकारी स्वाधीनता लाभको जो आशा था, वह बिलकुल जाती होगा। आप लोगोंसे अनुरोध है, जिससे जहांगीरको रहा। फिर भी उन्होंने यङ्गालसे मुगलों को मार भगाने गद्दी मिले उसके लिपे कोशिश करेंगे।' इतिदासमें का उद्योग छोड़ा नहीं। लिखा है, कि राजा मानसिंहने स्वार्थसिद्धिके लोभसे पद्ध ... पठानोंको समूल निर्मूल कर मानसिंह सम्राटका | सम्राट के शेष दिनमें जो पहयन्त . जाल फैलाया था अभिनन्दन करनेके लिये दिल्लीको चल दिये। इस यार | उसोसे उनका माणवियोग हुआ। अकया देखो। सम्राट्ने ७ हजारो सेनानायकका पद दे कर इनका ____ अकवरशाहको मृत्युफे वाद १६०५६०में राजा मानसिंद बड़ा सम्मान किया था। उनके पहले मुगलसरकारमें | और आजिम वादशाहको पातको विलफुल भूल गये और ऐसा मानसूचक पद और किसीके भो भाग्यमें नहीं | खुशमको सिंहासन पर बैठानेकी कोशिश करने लगे। पदा था। हिन्दू होते हुए भी वे मुसलमान सेनापतियों में लाख कोशिश करने पर भी उनका मनोरया सिद्धन ___roi. XVII, 105