पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५०१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


पायावाद ___ अखएड चेतन अद्वयब्रह्माकी पार्श्वचर-शक्ति अज्ञान है, वैसे ही अज्ञान भी भाव अभाव व्यतिरिक्त है। इसके प्रादुर्भावसे अन्तःकरण आदिकी उत्पत्ति है । अज्ञान शशङ्ग (खरहेके सींग को । होती है। इसके उपरान्त ये अन्तःकरणादि परिच्छिन्न | तरह-बन्ध्या-पुत्रके समान प्रात्यन्तिक अवस्तु

जीव है फिर इसके हट जानेसे ये अपरिच्छिन्न और नहीं । पोंकि यह जीवमात्रमें हो है, ऐसा अनुभव
निरक्षन है। ब्रह्मकी यह शक्तिविशेष ही शास्त्रमें ऐशी होता है। अज्ञान ब्रह्म पदार्थको तरहकी वस्तु भी

शक्ति, जगत्योनि, भज्ञानशक्ति, मायासृष्टिशक्ति और नहीं है क्योंकि ज्ञान होने पर भी यह स्थायी नहीं रहता, "मूल प्रकृति इत्यादि नामों से परिभाषित होती है । अन्त: ज्ञानोत्तरकालमें वह मिया हो प्रतीत होता है। जो प्रपञ्च या पाह्यप्रपञ्च सभी उरज्ञान या मायाका विलास | त सभी रक्षान या मायाका विलास नहीं रहता, वह कालिक अस्तित्व नहीं, जो मिथ्या , 'है। इसीलिये यह भ्रान्तिका विज़म्भन कहा गया है।। या भ्रम प्रत्यक्ष है, उसे किस तरह वस्तु कहा जाय ? अत- । शकिकपी ब्रह्माधित अज्ञान ब्रह्ममें या ब्रह्मको | एव यह वस्तु या अवस्तु, सत्य या मिथ्या सानयव या । जगत् रूपसे दिखा रहा है। इसलिये जगत् और ब्रह्म निरवयव-कुछ भी नहीं रह जा सकता। जिसको इस समय विमिश्रित या एक तरहके दिखाई देते हैं। यह अमुक या अमुक तरहका कह कर ग्रहण किया नहीं' ..अशान, विकार या जगत् परमार्थ द्वप्टिसे सत्य नहीं है, जा सकता वह अनिर्याच्य है। इसीलिये शास्त्रमें कहा है कि जगत् मिथ्या और ब्रह्म यह भी नहीं कहा जा सकता, कि ज्ञानका अभाव हो • सत्य है। अज्ञान है। क्योंकि ज्ञानका अभाव "अज्ञान" है इस ! . ब्रह्म स्वयं अपनी माया द्वारा आकाशादिरूपमे विवा वाक्यमें शान शब्दके अर्थको पालोचना करनेसे देखा तित हुए हैं। अतएव अभिन्न निमित्तोपादान ये ही जाता है, कि अभाव पदार्थ नहीं है। शास्त्रमें चैतन्यको - इस प्रसारके कारण हैं। अभिन्न-निमित्तोपादानका शान कहा गया है। फिर बुद्धिको भी शान कहते हैं। कुछ · दृष्टान्त,मकड़ा है। मकड़ा सृज्यमान सूतेके प्रति.खचे. लोग ज्ञानको आत्माका गुण यतलाते हैं। • तन्य प्रकाशका निमित्त कारण है। मफड़ा जिस सूतेको अशान इन तीन तरहके शानों में किस ज्ञानका अभाव ...सृष्टि करता है उसका उपादान यह किसी दूसरी जगहसे है? इसके उत्तर में कहा गया है, कि प्रथमोक्त ज्ञान नित्य · नहीं लाता, उसके शरीर हो में है। ब्रह्म अपनी इच्छा निरषयय है; अतएव उसका अभाव अस्वीकार्य है। .होसे विवर्तित होते हैं । विवर्त शब्दका अर्थ इस द्वितीय यास्तविक शान नहीं, क्योंकि यह जड़ है। बुद्धि प्रकार है, एक प्रकारकी वस्तु जय दूसरे प्रकारको हो | पृत्ति स्वयं वस्तु प्रकाश नहीं करती, चैतन्य व्याप्त हो • जाती है तो उसे विकार और मिथ्या प्रतीत होने पर वस्तुको प्रकाश करती है। पद्धिति जय चैतन्यको । पर उसे विवर्त कहते हैं। जगत् ब्रह्मका विकार नहीं, | छोड़ कर वस्तुके प्रकाश करने में समर्थ नहीं, तब वह चरन विवत है। अतएव पहले ही कहा जा चुका है अवश्य ही जड़ है। शानका अर्थात् चैतन्यका संश्लिए कि यह जगत् तात्विक सत्ता शून्य अर्थात् मिथ्या है। रहने के कारण लोग उसे उपचारकमसे ज्ञान कहते हैं। .. मायाको सरल भाषामें अज्ञान कह सकते हैं.। इस : अतएव अज्ञान उसका भी अमाव नहीं-सुतीय पक्ष अशान कालक्षण : 'अज्ञानन्तु . सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं भी नहीं। क्योंकि शान नामक आत्मगुणका बिल्कुल त्रिगुणात्मक मानविरोधिभावरूपं यकिञ्चिदिति वदन्ति। ममाव होना असम्मय है । कारण जभी-'मैं अहानी (वेदान्तसार) था, कुछ भी नहीं जानता था" कहोगे तभी तुम्हारे ____ अज्ञान क्या है? अशान एक तरहका ज्ञान-नाशक- शानका अस्तित्व प्रमाणित होगा। उस समय तुम्हारा अनिर्याच्य-रहस्य है। उसका भाव और अभाव- दूसरा कोई शान न हो सही; किन्तु महान विषयक घस्तु और अवस्तु-इन दोनोंसे पहिभूत है। तीसरो ज्ञान था। तुम जो अज्ञानी थे इसका यनुभव भीएक प्रति अर्थात् क्लीवक जैसे स्त्री-पुरुष-दोनोंसे बहिर्मूत | तरहका शान ही है। "मशान" या इसका अर्थ क्या है?