पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५००

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


४४२ . पायायन्व-मायावाद: लोग उन्हें सहजमें मार सकोगे:। इतना कह.फर विष्णु | मायावरम्-१. मान्द्राजप्रदेशके तऔर जिलान्तर्गतः एक. अन्तर्धान हो गये। तालुक । भू-परिमाण ३३२ वर्गमील है। : . ." । अनन्तर मायामोह दैत्योंके निकट जा कर उन्हें 1 . २ उक्त जिलेका.एक नगर। यह अक्षा ११६२० . नाना प्रकार तफै और युक्ति द्वारा मोहित करने लगा। उ० तथा देशा० ७६ ४१.५० पू० कावेरी नदीफे किनारे अतएव वे शीघ्र ही यलहीन हो गये। तब देवताओंने अवस्थित है । दाक्षिणात्यवासी इसको तीर्थस्थान सम- उन्हें आसानीसे परास्त किया। . झते हैं। यहां साउथ इंडियन रेलवेका स्टेशन. होनेके (विष्ण पु० ३१७-१८ अ०) कारण वाणिज्यमें विशेष सुविधा हुई है। मायायन्त्र ( स० क्ली० ) सम्मोहन, किसीको मोहनेकी मायायसिफ (सं०.त्रि०) मायया वसं. आच्छादन करो- .. विधा। तोति ठन् । परप्रतारक, वञ्चक, छ लिया। । । मायारवि ( स० पु०) सम्पूर्ण जातिका एक राग। मायावाद:( स० पु०) मायायाः वादः । मायाविषयक इसमें सय शुद्ध स्वर लगते हैं। कथन । यह परिदृश्यमान जगत् भ्रान्तिमय है। यथार्थः । मायारसिफ ( स० पु० ) परमतारक, मायापटु । में इसको स्वाभाविक सत्ता ,नहीं । माया द्वारा ही इसका . मायावचन, (स' फ्लो०) छलवाफ्य, फरेवकी वात ।। अस्तित्य उपलब्ध होता है। वेदान्तके शारीरिक भाप्यमें मायाव? ( स० पु०) शवरराजभेद । इत्याकार मायाविषयक जितनी युक्तियोंकी आलोचना मायावत् (स' त्रि०) माया विद्यतेऽस्य मतुप मस्य घ। हुई है, उसको हो मायावाद कहते हैं। , . . . १ मायाविशिष्ट, मायावी, कपटी। (पु०) २ राक्षस, ___यह दृश्य-जगत् इन्द्रजाल के सद्गुश है, तात्त्विक- असुर । ३ कंसराज, कंसका एक नाम । .. सत्ताशून्य अर्थात् मिथ्या या झूठा है । जैसे कोई : मायावती ( स० वी० ) मायावत् स्त्रियां डीप । १ नट इन्द्रजालिक कौशलादि माया द्वारा इन्द्र कामपत्तो, रति । इसका मायातो नाम होनेका कारण | जालकी सृष्टि करता है वैसे. ही महामायाची ईश्वर . विष्णुपुराणमें इस प्रकार लिखा है, पहलेमें जब भी स्वेच्छापूर्वक इस नश्यमान जगत्को सृष्टि करते हैं। . कामदेव महादेवके फोपानलसे दग्ध हुआ तब रतिने । उनको इच्छा. हो माया नामसे पुकारी जाती.है । गुणवती अपने स्वामीको फिरसे पानेके लिये मायारूपसे शम्वरा- माया एफ होने पर गुणके प्रभेदसे अनेक रूप धारण सुरको मोहित कर रखा और उसे मायारूप दिखाया। फरती है। उत्कृष्ट सत्त्वगुण द्वारा माया और मलिन इसीसे उसका नाम मायावती हुआ । सत्यके गुणसे अविद्या पन जाती हैं। मायाका उपहित २ विद्याधरी विशेष । ३ राजकन्याविशेष । इनके ईश्वर और अविद्याका उपहित जीय हैं। जोध केवल पिता राजगृहाधिपति मलयसिंह थे। उपहित ही नहीं वरं मायाके वशीभूत ,भी. है। माया (कथासरित्सा० ११२।१।२) एक है-इसीलिये ईश्वर भी एक है।. मालिन्यके न्यना. धिपयके अनुसार अविद्या अनेक है । इसीलिपे जीव भी. अनेक हैं . मायाकी ज्ञानशक्तिका चरमोत्कर्ष है। इसीलिये,

  • "इयं मायावती भार्या तन्यस्यास्य ते सती । उसके उपहित ईश्वर भी सर्वेश्वर हैं, सर्वश हैं,, स्वतन्त

हैं और सर्वनियन्ता हैं । जीव शानशक्तिके अल्पभाव . मन्मथे तु गते न शं तदुद्भयपरायणा। यशतः वैसा नहीं है। जैसे एक ही आकाश :घटरूप. " . शम्बर मोहयामास मायारूपेण रूपिणी ॥ उपाधिसे घटाकाश, उसको छोड़ कर महाकाश है घेसे. - ; व्यवायायु पभोगेपु रूपं मायामयं शुभम्। , . . हो ब्रह्म मनुज आदि उपाधिसे (आधेयमें) जीव.और तदु" , दर्शयामास दैत्यस्य तस्येयं मदिरेक्षणा ॥" . . . पगतमें ब्रह्म हैं। .: . . . . . . ( विष्णुपु०. ५॥२७ अ०)' अशान ही ससार,है । संसार और कुछ भी नहीं है। .. शम्बरस्य नभाय यं श्रयतामा कारणम्॥