पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७१३

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मोना ६३०

शिल्पका काम बड़ो निपुणताके साथ होता है। इनमें | लगा था। इसको देख कर सर जार्ज बाउंउडने कहा

दिल्लीका शिल्प 'कुछ कुछ। जयपुरको बराबरी कर था, कि यह भारतीय मीना शिल्पका अद्वितीय स्मृति- सकता है। | स्तम्भ है। कहा गया है, कि इस मोनाशिल्पको मानसिंह - ववलपुरमै घड़ी बड़ी घस्तुमओ में मोनाका काम होता | लाहोरसे जयपुरमें लाये थे। जयपुर में जो सब भुवनविण्यात है। कहा गया है, कि ४०० वर्ष पहले सुलू नामके एक शिल्पी उत्पन्न हुए थे, उनमें कुछ के नाम इस तरह हैं:- मनुष्यने इस मीना-शिल्पका आविष्कार किया था। उस हरिसिंह, अमरसिंह, कृष्णसिंह आदि। इनमें हरिसिंह समयसे इसको बड़ी उन्नति हुई है। और कृष्णसिंह समधिक प्रसिद्ध है। .... बङ्गालमें किसी गहने में मोना लगाने में एक रुपये काश्मीरमें भी मोनाफे कामको बड़ी उन्नति हुई है। भरोसे लगायत २ रुपये भरी तक खर्च पड़ जाता है। भारतवर्ष के अनेक स्थलों में काश्मीरकं मोनाशिल्पको योधपुरमें 'हिमनिया' नामका एक सोनेका गहना चीजें विकती हैं। काश्मीरका मीना प्रायः नीले रंगका तैयार होता है। यह कण्ठ के रूपमें पहना जाता है। होता है। यहां तरह तरहके लोटे, गिलास, डमरू आदि यह गहना भारतीय और औपनिवेशिक प्रदर्शिनियोंमें वाजे और विविध अलंकारों पर मीनाका काम होता है। विशेष प्रशसित हुआ था। इसका मूल्य २०) से २००)। कश्मीरी शालको पारीक दस्तकारी मोना शिल्पका रुपया तक है । मारयाएकी हिन्दू स्त्रियां इसका नैपुण्य भी दिखाई देता है । मोनाके कामका वरतन बजन- आनन्दके साथ व्यवहार करती हैं। बांकानेरमें भी मीना-1 के हिसावसे विकता है। चांदोका मोना सया रुपये भरी शिल्पका प्रचलन है। मीना लगाने में ३) रुपये भरी मज-' और तांबेका मीना ढाई आनेसे चार आने तक दूरी पड़ जाती है। भासामके अन्तर्गत जोडहार प्रान्तमें | विकता है। वर्ण मोनाका प्रचार है। किन्तु विको अधिक न रहनेके, दिल्लीके मीनाके शिल्पमे पानदान और हुपके यहत कारण फ्रमशः इसका हास हो रहा है। इन्दीरमे भो । विख्यात है । झङ्ग, मुलतानका गिलास मशहूर है । जयपुर-

  • मीनाका.काम होता है।

को शिल्पप्रदर्शनीके समय वहवलपुरसे मोना शिल्पका . .१६वीं शताब्दी में जयपुरमें मीनाशिल्पको अत्यन्त । एक बोतल गिलास और शिशियां भेजी गई थी। इनका उन्नति हुई थी। मुगल-सम्राट अकबर के दरबार में मान शिल्प बड़ा ही मनोहर था। इनमें प्रत्येक यथाक्रम ८५), सिंहके 'मीनाशिल्पकी एक छड़ी थी। यह अकवरके ८७) और १७) को विका था। सिंहासनके समीप रखी रहती थी। मानसिंह यह छड़ो। कलकत्तेको अन्तर्जातीय महाप्रदर्शनी में लखनऊसे ले कर अंकवरके दरवारमें जाया करते थे। ५२ इन्च लम्बी एक हुक्का मोनाका काम किया हुआ आया था। इस पर इस छड़ीमें ३३ स्वर्ण-मण्डित तायेकी चुङ्गो लगाई गई ! जैसा कारकार्य स्वचित हुआ था, उसकी प्रशंसा किये थी। इसके दीघ वोचमें रंग विरंगे स्वर्णके साथ होरेकी । विना नहीं रहा जाता । राजपूताने प्रतापगढ़में एक जहाई हुई थी। इसमें मीनाके कामका शिल्प-नेपुण्य देख कर तरहके नकली नोले मोनाका काम होता है। यह इस अवाक रह जाना पड़ता था। इसके किसी किसी स्थानमें ' तरह छिपा कर तैयार किया जाता है, कि शिल्पियों के मोनाके काममं हरी हरी घास चरती हुई गायें दिखाई देती कुटुम्यक सिवा और दूसरा कोई नहीं जान सकता। ये यो, किसी किसी जगह खिले हुए हरे पीले पुष्प-पक्ष अपूर्वः सब शिल्पो हाथी घोड़े आदि कई तरहके जीव जन्तुमी. सोमा धारण करते दिखाई देते थे। जिस शिल्पोने इसे की पौराणिक चित्रावली और नाना 'तरहक पिचित्रं तैयार किया था, इस सभ्य जगत्में उस तरह शिल्पो ' वस्तुओं पर नकली मीनाका काम करने है। इनकी इस. अत्यन्त बिरम हैं । इस समय भी जयपुरसे मोनाकामका गिल्पनेपुण्यको पराकाष्ठा देख कर चमत्रत होना जो पात किस माफ वेल्सको उपहारमें दिया गया था, : पड़ता है। आज भी इनकी शिल्पसम्बन्धी याने कोई नहीं यह भी अत्यन्त उल्लेखनीय है । इसके बनाने में चार वर्ष जानता। Yol, ITII. 100