पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/७२०

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मीमांसा .

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• जाता है। ऐसे स्थानमें भी अतिदेश-विधान और कार्य ऊपर लिखे १२ अध्यायोंको छोड़ चार और अध्याय • फरणकालमें ऊह-विचारके सिद्धान्तोंका आश्रय लेना - पाये गये हैं, इन चार अध्यायों का नाम सङ्कर्षकाएड है। पड़ता है। जैसे, मधुके स्थानमें गुड़ देनेको | भाष्यकार शवर स्वामी अथवा वार्तिककार कुमारिल ध्ययस्था है, लेकिन जहां मधुके स्थानमें गुड़ दे कर काम | अन्तके इन चार अध्यायोंका कोई उल्लेख नहीं करते हैं, चलाया जाता है वहां "मधुचाता ऋतायते" इत्यादि मन्त्र इसलिये शंकराचार्यके मतवाले इन्हें मीमांसासूलमें पढ़ना चाहिये कि नहीं यह प्रश्न उठ सकता है। कारण नहीं लेते लेकिन रामानुभके मत माननेवाले इन चारों मधु रहने पर तो यह मन्त्र अवश्य पढ़ना होता, लेकिन जव अध्यायोंको मौलिकताको स्वीकार करते हैं। उपसंहारमें मधु न रहे, तब प्रश्न है, कि ऐसे स्थानमें उस मन्लको मीमांसाके इतिहासमें आलोचना देखो।। ....... . पढ़ने की आवश्यकता है कि नहीं। अव ऊह विचारका .. इस दर्शनको आवश्यकता। ,, , मिद्धान्त है कि ऐसे स्थानमें भी उक्त मन्त्र ज्योंका त्यों __महामुनि जैमिनिने अपने दर्शन में विशेषतः इन्हीं सव पढ़ना चाहिये। विषयोंका विचार और सिद्धान्त निर्णय किया है तथा दशवे अध्यायमें वाध-निणय है। वाध शब्दका प्रसंगघश और और विपयोंकी भो पालोचना की है। अर्थ निवृत्ति है। कहां किस मन्त्र या द्रव्यको निवृत्ति मीमांसा दर्शनमें जिन सब विपयोंका विचार किया गया त्याग करना होगा उसका निर्णय करना चाध विचारका है वे सभी चैदिक हैं। उद्देश्य है। • ग्यारह अध्यायमें तन्त्रता है। इसका लक्षण- वेदोंमें याग, दान और होमादि विषय भिन्न भिन्न "अनेकमुदिभ्य सकृत् प्रवृत्तिस्तन्त्रता" बहुत कर्मोके उद्देशसे स्थानों में जिधर तिधर लिखे गये हैं, उन्हें देख कर अगोभूत एक कर्म करनेको तन्त्रसिद्धि कहते हैं। अर्थात् | योगादि करना अत्यन्त कठिन है और पद पर पर भूल जिस स्थानमें एक कर्चाको अनेक कर्म करना है ऐसे होनेकी सम्भावना है । महामुनि जैमिनिने मीमांसादर्शन- 'स्थानमें एक अर्गके अनुष्ठानसे औरोंका फल मिल | की रचना कर याशिक लोगों के कष्ट और सन्देहको दूर जायेगा। इस तरहका निर्णय करना तन्त्रता विचारका ! कर दिया है। मीमांसादर्शनके वाद होसे कर्मकाण्डको उद्देश्य है। जैसे स्नान प्रत्येक क्रियाका अग है, शास्त्र. पद्धति और शिक्षा सुगम हो गई है। . . . . की सभी क्रियायें स्नानके बाद ही की जाती है लेकिन वेद। ...... ........ 'कर्ता यदि एक दिनमें पांच कर्म करे तो एक ही वार महामुनि जैमिनिने वेदको मन्त्र और ब्राह्मण इन दो स्नान करना होता है, वार वार स्नान नहीं करना भागों में बांटा है.। "मन्ववाहाणपोर्वे दनामधेयम्" मन्त्र होता । उस एक हो स्नानस और स्नानोका फल मिल और ब्राह्मण दोनों भाग हो वेदके नामसे प्रसिद्ध हैं। जायंगा। ' पीछे फिर इन दो विभागों के दूसरे तरहके विभाग बारहवें अध्यायमें प्रसङ्गनिर्णय है। इसका.अ.है किये गये हैं। जैसे ऋक्, यजुः और 'साम यही "अन्योद्देशेऽन्य. सिद्धिः प्रसङ्गः", एक कार्यके उद्देशमें | तीन विभागं । ' दूसरे कार्यकी सिद्धिको प्रसंग कहते हैं यानी "एक पंध मन्त्र और 'बाहाणका इस प्रकार लक्षणं निर्धारित दो काज-" एक कार्यके लिये कुछ करने पर यदि अनि हुआ है। "तचोदकेपु मन्त्राख्या" "शेपे ब्राह्मण-शब्दा" ' 'चार्यरूपंसे दूसरा कोई फल सिद्ध हो जाय, तो उसे जो अनुष्ठान करनेके समय उपयुक्त मनुष्ठेय भयंका शान प्रिसंगसिद्ध कहते हैं। जैसे आमके लिये वृक्ष रोपा जाता| कराता है, उसको. मन्त्र तथा उसे छोड़. वायसन्दर्भ- । लेकिन साथ ही छाया आप हो मिल जाती है। किसी को ब्राह्मण कहते हैं। फिर भी किसी किसोके . मतसे एफ प्रधान यागके लिये पुरोडास तैयार करने पर फिर ऊपर कहे गये लक्षण प्रायिक हैं.1, "प्रयोगसमवेतार्थ । सरे यागके लिये उसे तैयार करनेका जरूरत नहीं। स्मारका मन्त्रा:" फिन्तु जो. मन्न कहं कर. सवं दिनों- पड़ती। गयागका.पुरोहास प्रसंगसिद्ध हुमा।..से प्रसिद्ध हैं केवल यही मन्त्र हैं। सूत्रस्थानके