पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/८४३

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मुनेर ७५३ कर्णके आनेसे पहले चण्डिकादेवी मन्दिरमें गये और थी। यह तर आज भी बोली घाट नामसे प्रसिद्ध है। पूजा करने लगे। पूजाके उपरान्त राजा कर्णकी तरह सुरगमें पत्थरकी सीढ़ी भी शोमतो थी। ये भी उस खौलते हुए घोमें फूद पड़े। दाकिनीने शाह सुजाकी अन्तःपुरचारिणी, जिहें सूर्य भी नहीं उनके शरीरका मांस खा कर अमृतकुएडके जलसे पुनः देख पाते थे, इस सुरंगसे गंगास्नान करने जाती थी। उनको जिला दिया। पूर्ववत् चण्डिका देवी घर देन को बहुतो का विश्वास है कि राजा कर्णने इसे बनवाया था। तैयार हो गई। प्रभुरत्सल विक्रमने प्रार्थना की, कि हिन्दू रमणियां इस सुरंगसे गङ्गास्नान करने जातो यो। माजसे राजा कर्णको इस स्थान पर माते हो धनरत्न | सुरंगमें वायु और रोशनोको सुविधाके लिये वीच वीचमें मिल जाय और इसके लिये उन्हें प्राणत्यागका कष्ट न बड़े पड़े सांभे गाड़े थे जिनका ऊपरी भाग खुला रहता भोगना पड़े। था। आज भी उनका सडहर दिखाई देता है। इसके । . देयी 'तथास्तु' कह कर अपने स्थानको चली गई पास दो कटहरणो धार है। इस स्थानसे भागीरथी और राजा विक्रमने कटाहको उल्टा कर कर्णके आनेसे | उत्तरवाहिनी हो गई है। पहले यहाँसे प्रस्थान किया। ___ दुर्गके बाहरसे मुंगेरका दृश्य बड़ा ही मनोरम

आज भी चण्डिकादेवीके मन्दिरको छत काद-सी, दिखाई देता है। इस भागमें बहुतसे लोग भो यस गपे

• दिखाई देती है। प्रवाद है, कि यह फटाह भाज भी छत हैं। शहरके प्रायः सभी हाट-बाजार, दूकान आदि इसी के ऊपर रखी हुई है। याहते हैं, कि जो मन्दिरमें अकेला भागमें अवस्थित हैं। रहता यह अपने प्राणसे हाथ धो घेठता है। शाहसुजाफ्री 'घौली' के समीप 'कटहरणी' का घाट . इस मन्दिरके समीप श४ शिवमूर्ति, अन्नपूर्णा और है। प्रबाद है, कि इस घाटमें बैठ फर मुद्गल ,ऋषि पार्गती मूर्ति प्रतिष्ठित है। शिवमूर्ति से एकका नाम तपस्या करते थे। उनकी तपस्याका ऐसा नियम था, .फालभैरव है। किचे एक पखवारा सिर्फ जल पी कर रहते थे और ... , मन्दिरफे याई भोर जो.पर्वत है उसका शिणर फरण दूसरा पखवारा चावलफा कण संग्रह कर खाते थे। उनकी चौरा' वा 'कर्णचत्वर' कहलाता है। यहां शामको दाता ऐसी कठोर तपस्यासे विष्णु भगवान् बड़े प्रसन्न हुए। कर्ण बैठा करते थे और इसी स्थान पर बैठ कर प्रतिदिन दूसरे पखवारेमें जव ऋषि चावलके कणको सिद्ध कर सवेरे सौ मन सोना चांदी दीन दुणियोंको दान करते थे। खानेका उद्योग कर रहे थे उसी समय भगवान् वृद्ध . कर्णचत्वएफे ऊपरमें एक पुरानी इमारत देखनेमें आती है। ब्राह्मणके घेशमें यहां पधारे। ऋपिने अतिथिके शुभा- पहले यहां मुगेरके सिविल जज रहते थे। पोछे मुर्शिदादाद- गमन पर प्रसन्न हो उस भोजनमेसे आधा निकाल कर के रहनेवाले अन्नदाप्रसाद राय बहादुर नामक एक जमी- अतिथिका सत्कार किया। छमवेशी नारायणने उससे दारने उसे पारीद लिया। लोगों को धारणा है, | तृप्त न हो कर दूसरा हिस्सा भी खानेको मांगा। इस पर कि जो उस मकानमें रहता है उसकी अकाल मृत्यु होती | पिने प्रसन्न हो. उसी, समय अपने . लिये रखा हुआ है। राय अन्नदाप्रसादको अकाल मृत्युसे तो यह धारणा भोजन भी उन्हें दे दिया। अतिथिके चले जाने पर . लोगों के हदयमें और भी पक्की हो गई है। अपि फिरसे तपस्यामें लग गये। इस प्रकार दो पक्ष .. दूसरे पर्वतके ऊपर, शाह-साहवका प्रासाद नामक | वोत गये। तोसरे पक्षमें वे पुनः चावल कण सप्रद कर एक सुन्दर अट्टालिका है। अभी स्थानीय कलकर उस. भोजनको तैयारी करने लगे। छद्मवेशी नारायणने मा कर में रहते हैं। इसके पश्चिम भागमें शाहजहां वादशाहके पूर्वयत् भोजनके लिये प्रार्थना की । ऋषि सन्तुष्ट चित्तसे ...लंडके सुलतान सुजाका सुरम्य राजप्रासाद था। अमी समस्त भोजन अर्पण कर फिरसे तपस्यामें प्रवृत्त हुए।

वद फारागार आदिम परिणत हो गया है। पहले इस | तय छद्मवेशी नारायणने अपना परिचय दे कर अपिको

प्रासादसे ले कर गङ्गातट तक एक सुरंग पोदी . गई! घर देना चाहा। ऋपि योले, 'भगवन् ! मुझे किसी वस्तुकी Nel. XVII. 189