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शहर के कुछ अच्छे नक्शे बनाए थे। इन नक्शों में इन तालाबों की स्थिति बताई गई है। ये नक्शे डायना एल. ऐक की सन् १९८३ में छपी अंग्रेजी पुस्तक 'बनारस सिटी ऑफ लाइट' में दिए गए हैं। प्रकाशक हैं: राउटलैज एंड कैगनपाल, लंदन।

तालाबों को नदियों के नाम से जोड़ने की प्रथा और भी हिस्सों में रही है। इसी संबंध में भावनगर के प्रसिद्ध गंगाजलिया तालाब का भी उल्लेख किया जा सकता है।

आज भी खरे हैं तालाब

हमारे अधिकांश शहर और जिन गांवों में उनके पैर पसर रहे हैं, वे गांव भी आज तालाबों की दुर्दशा के दुखद संदर्भ बन सारे देश में फैल चुके हैं।

अध्याय का प्रारम्भिक भाग तैयार करने में हमें श्री रामेश्वर मिश्र पंकज के साथ हुई बातचीत से बहुत मदद मिली है।

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में बन रहे तांदुला तालाब की जानकारी हमें मध्य प्रदेश संदेश के सिंचाई विशेषांक के अलावा श्री जी.एम. हैरियट द्वारा १९०१ में तैयार की गई तत्कालीन सेंट्रल प्राविंसेस पर एक सरकारी रिपोर्ट में देखने मिली। 'सेंट्रल प्राविंसेस पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट: नोट ऑन इरिगेशन इन सेंट्रल प्राविंसेस विद अपेंडिसिस एंड टेबल्स' नामक इस रिपोर्ट में इन इलाकों के अनेक छोटे-बड़े तालाबों पर पर्याप्त अच्छी जानकारी है। गुणीजनखाना से संबंधित सूचना हमें श्री नंदकिशोर आचार्य से प्राप्त हुई है। उनका पता है: सुथारों की बड़ी गुवार, बीकानेर।

मैसूर राज्य के विषय में सन् १९०१ में प्रकाशित 'मैमोरैंडम ऑन इरिगेशन वर्क्स इन मैसूर' नामक एक रिपोर्ट, सरकारी विभागों द्वारा इन तालाबों की हुई छीछालेदर की पृष्ठभूमि पर ठीक प्रकाश डालती है।

'वार्ष्णेय गीतमाला' में गारियों के बीच में "फिरंगी नल मत लगवाय दियो" की पंक्तियां हमारे समाज में रचे-बसे स्वभाव की झलकी भर नहीं हैं। इस गीतमाला में समस्त शुभ अवसरों—होली, विवाह, कुआं पूजन जैसे पर्वों-त्यौहारों पर गाए जाने वाले गीतों का संग्रह भी है। अलीगढ़ की सुश्री रामदेवी वार्ष्णेय ने इन गीतों का संकलन किया है और दिल्ली की सुश्री त्रिवेणी देवी ने इस गीत माला को छपवाकर अपनी तरफ से बंटवाया है। अन्यथा यह पुस्तिका बिक्री के लिए नहीं है। त्रिवेणीजी से

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