पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२४

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समानता-स्वाधीनता की मॉग पेश की । सन १६२६ मे साम्राज्य-परिपद मे उपनिवेशो निम्न प्रकार स्वीकार की गई :-

"उपनिवेश ब्रिटिश-साम्राज्य मे स्वाधिन राज्य हैं, जो पद में समान हैं और किसी प्रकार भी किसीके अधीन नही हैं; वे अपने बाह्य तथा आन्तरिक शासन-प्रबध मे स्वतंत्र हैं तथा ब्रिटिश राजसत्ता के प्रति भक्ति के एक साधारण बन्धन मे बॅधे हुए हैं ।" उपनिवेश ब्रिटिश पार्लमेन्ट की सर्वोपरि महत्ता को ग्वत्म करने की मॉग करते रहे । फलतः वैस्टमिन्स्टर विधान बना । सन १६३१ की साम्राज्य-परिपद ने इस विधन को बनाया, जिसके अनुसार उपनिवेशो की पार्लमेन्टो को यह अधिकार मिल गया कि उन पर लागू होनेवाले ब्रिटिश पार्लमेन्ट के किसी भी कानून को वे रद या उसमे संशोधन कर सकती हैं । साथ ही बिना उपनिवेश की सहमति के वैस्टमिन्स्टर-पार्लमेन्ट द्वारा स्वीकृत किया गया कोई कानून उस पर लागू न होगा । उपनिवेशों पर लागू हो सकने की सम्भावना को दूर करने के लिये एतत्सम्बन्धी एक पुराना कानून भी हटा लिया गया । इस समय राजनीतिक दृष्टि से उपनिवेश स्वाधीन तथा प्रभू राज्य हैं । उनकी अपनी पार्लमेन्ट तथा सरकारे हैं । अलबत्ता ब्रिटेन का राजा, उपनिवेश का भी राजा कहलाता है । प्रत्येक उपनिवेश को शान्ति तथा युध्द के सम्बन्ध मे निर्णय करने का अधिकार है । इस समय समस्त उपनिवेशो ने ब्रिटेन के साथ जर्मनी के विरुध्द युध्द-घोषणा कर दी है, केवल आयर तटस्थ है । प्रत्येक उपनिवेश मे, आयर को छोड़कर, राजा का एक प्रतिनिधि रहता है, जो गवर्नर-जनरल कहलाता है । उसके सुपुर्द कुछ शाही काम रहता है । प्रत्येक उपनिवेश की ओर से लन्दन मे एक हाई कमिश्नर रहता है और ब्रिटिश सरकार भी प्रत्येक उपनिवेश मे एक हाई कमिश्नर रखती है ।

ब्रिटिश मत्रि-मएडल का एक सदस्य उपनिवेशो का मत्री भी होता है । समस्त साम्राज्य के प्रश्नो पर विचार करने के लिए एक साम्राज्य-परिषद भी है, जिसकी बैठक कभी-कभी होती है । सन १६०७ से इसमे भारत के प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं, यध्यपि ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे महान देश- उसके मुकुटमणि- भारत का, साम्राज्यान्तर्गत त्र्प्रभी कोई पद नही है ।