पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/१४२

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॥१२ ॥ कहो ाई कहात हे दुष्ट तापसि कोन ॥ . पूर्व मम तव भयो संगम कहति हो तुम जोंन । जालु भावे रुल्लु बेठि हो न समुझत तीन ॥ सुनत ऐसे बचन नृप के भई निमल रूप।। कोप ते मे चपल खबछ अक्षि अरुण अनूप । रहम चाहति ममळु तिरछे लखति भूपति श्रोर।। परम सोम्य शकुन्तला सो क्रोध प्रेरित घोर॥ कोर तप को सेज धारण कहे नृप सो बैंम। जानिके इमि कहत हो यह उचित तुम कों हे न॥ सत्य और असत्य मानत सकल श्रात्मा जोन। करत जोन असत्य ता को महा पातक तोम ॥ एक हम ही रहे मानत नही जो हृदयस्थ । कर्म साबी जीवजन को सकल पथ्य अपथ्य । सुन? भूपति कर्म साक्षी रहत ईश्वर पाश। सूर्य्य शशि अरु अमिलश्रमलो भूमि रूप प्रकाश ॥ शलिल ग्रह निशि धर्म साक्षी गुणो अरु यमराज । कस्त नर जो कर्म तेसो देत फल महराज ॥ . स्वयं बाई इहा मे पति धर्म धारे.धीर। योग्य श्रादर मो मिणदर करण योग्य न बी॥ ग्राम्य जन लों सभासद मे करत मो अपमान। करति हो कारुन्य रोदन सुनलु भूप सुजान। जोंम माग्यो वचन तुम सों करलुगे महि सोय।