पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/३५

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• ॥१८॥ विधि नग को स्यालु देषि इह मन में बिचास्न लार को फल भयो। अब अगु बांध्यो अब मेरो मनोर्थ । य्या को मांस ले जेठं तब लोलु अरु सउ में पाईहीं। को देषि फुल्यो। देषिकरि पुकारी म्यंत्र मेरे बंधन : लेलु। जाते नीति में ऐसी कही है जु आपदा मै म्यः में सूर जाणिजे धन में निरलोभ लोई सुपबित्र जांणि असत्रि की परख्या जाणिजे दुष मे बंधु जाणीजे। के स्याल सुने जाल को देषि बिचारन लाग्यो ईल तो तब स्याल बोल्यो। म्यंत्र यह जाल तांति को हे श्रा तन करि क्यों हुवो म्यंत्र जु और भांति मन में मति तु कलिले सु करिहों। आगे काग प्रात काल जब ऊ षोज करन लाग्यो। षोज करत करत जाल में बांध करि काग बिचारन लाग्यो। तब प्रग सौं कलित है ! तब म्रम करितु है। म्यंत्र तेरे कम्यो न कीबो ता को जो हितकारी यंत्र को कन्यो न माने ता को बिपरि तब काग कही। तेसै म्यंत्र स्यालु कहां । अंग करितु । अर्थी ईहां की है। तब कागु कहि । म्यंत्र मे तुम सों : थी। यह बात कबलु न बिचारिये जु हम जा को बु हमारी काहे को करिहे यह जांनि काळु की प्रतीति दुष्ट साई सुभले कु सु बुरी करे। तब स्वास लेकरि का दुष्ट स्याल पापी ते ईद कोण वरुण करम कीयो। जा बातन करि प्रीति उपराजिकै मैत्रि करिये मैत्रि करिब