पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/४९

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सील जहां किरारा हे व्या हि तरंग है जिन विषे जाते करि अंतकरण सुध न होई। और सुनो। जन्म ईन बेट्न करि व्यापत ईल संसारु या संसार मे कनु ताते संसार छाउिये तो ही सुष लोई । जाते टुष ही । टुष ही के नाम को सुष करि मानत है जैसें भार बा. सुष करि माने। तब कोअन्य कहि। ईह बात ऐसी ब्राह्मण मो कू श्राप दोयो। रे सरप तु प्राजि ते मे लोलु। तब पुनि कपिल ब्राह्मण कहि। अली कोपन को जोग्य है अब उपदेस सुनि। जाते संगु सखथा न सकिये तो साध जन पंडितन को संगु करिये। संग ते सब संगु छूटे हि साधु जन पंडित संब को सं सुनि उनि कोपन्य ब्राह्मण सोक छाडि संन्यास ब्राह्मण को आप भोगिवे कू भेउकनि बालिखे कू तब उन जलपाद नाम मैउकल को राजा तिहि से कयो। तब उह मेउक सांप की पीठि परि चल्यो। वा को पीठि परि चढाई ले फिरन लाग्यो। जब दुरं सक्यो तब मेउकन के राजा कनि। काले तुम्ह प्राजि तब सांपु कहि। अहार बिना दुषी हों चलि नाही । कलि। मेरी सेन्या के मैडकन को मेरी अाग्या ते ष' कहि। राजा इह मो कू बडो प्रसाद कीयो। ईल व षान लाग्यो। जब ईद भांति मैउक सब षाये तब । पायो॥