पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/६८

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॥५२॥ ली बैठी रही। रानी सुनि रोइ उठी । पदमावती जी ने कयो जो काले रोवो को स्वामी जी नीके हैं। कछु दिन बीते रानी ने फेरि राजा सों कयो। राजा ने सुनि माथा धुन्यो कि यह सब स्वामी जी को उपदेश धूरि में मिलावे हे हमारे गरे छीदे है। जब रानी पर परी अन्न पानी छांडि दियो तब राजा ने तैसे फिरि कल्खाय पठायो। पदमावती जान्यो कि यह निगोड़ी बार बार परिक्षा के हित दुख दियो करेगी सुनते प्रान छाडि दियो। यह देखि एनी को मुख सेत वै गयो। राजा चिता रचि जस्न चल्यो। जयदेव खबर पाइ अाइ पत्रावती जू को अष्टपदी गाय जिवाब दे राजा को समाधान करि बिदा के किंटुविल्व चले आये। किंटुविल्व तें गंगा जी अठारत कोस रहे जयदेव कों नित नहाने जाने को नेम ले। जब वृद्ध भये तब गंगा जी ने आमा दई अब मति प्रावो ध्यान कियो करो। इन मान्यो नहीं। तब गंगा जी ने कल्यो लम ही तुलारे निकट अावें हैं। तिन कयो प्रतीत केसे होय । कल्यो कमल फूलो आवेगो ता तें जानियो। तेसे ही भयो। अाज लग गांव के नीचे धारा बड़े है॥ इति ॥