पृष्ठ:Garcin de Tassy - Chrestomathie hindi.djvu/९६

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तेलिनि के मन उपज्यो यापू। कंत मखो तें दियो सरापू॥ अब मोहि कहा कहत है भाई। मेरी मीचु पलक में पाई॥ पीपा को भक्ति जो करन्। मृतक जीव लोइ बरि न मरतू॥ इतनी सुनि तेलिनि सुख पायो। वालि बोल दे मृतक जिनायो॥ घर ले आए दीक्षा दीनी। भक्त बुलाय महोछो कीनी॥ . . ___कागद ले कोरो कसो बनियां को सोक ल्यो। बडो व्योमो सेठ सूटीनी। कलो पाप ते मांगिन लीनी॥ दीन्हो बोलि टका से चारी। कागद लिख्यो साखि दे भारी॥ तब दीजो जब लोइ तुमारे। नहि कछु आतुर अहे हमारे॥ छठे महीना माग्यो पानी। झगरो को न माने कानी॥ . पीपा कर कबै धन दीनो। को है साखि कबे लम लीनो॥ तब पंचन में पत्र मंगायो। कोणे कागद निकरि जु आयो। सब कागद घर मंह को देखें। उत्तम कहा पुरातन पेवे॥ झूठो भूठ कन्यो सब काढू। बलुरिन उत्तर दीन्हो साढू ॥ भरी सभा में साकु खिस्यानो। पीपा कन्यो लियो में मानो॥ हरि की माया गरि जन स्वाई। तुम क्यों झूठी करी बाई॥ ज्यों ज्यों उपजे देवों तोही। अपने कर जो दीन्ही मोही॥ कागद सकल सुत्रहर किया। तब सुख उपज्यो सानु के लिया । दीक्षा दे बनियां सिष कीन्ही। और भेट पीपा कर दीन्ही ॥