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हिन्द स्वराज्य


अप्रामाणिक[१] होते हैं, एक ही बातको दो शकलें देते हैं। एक दलवाले उसी बातको बड़ी बनाकर दिखलाते हैं, तो दूसरे दलवाले उसीको छोटी कर डालते हैं। एक अखबारवाला किसी अंग्रेज नेताको प्रामाणिक[२] मानेगा, तो दूसरा अखबारवाला उसको अप्रामाणिक मानेगा। जिस देशमें ऐसे अखबार हैं उस देशके आदमियोंकी कैसी दुर्दशा होगी?

पाठक: यह तो आप ही बताइये।

संपादक: उन लोगोंके विचार घड़ी-घड़ीमें बदलते हैं। उन लोगोंमें यह कहावत है कि सात सात बरसमें रंग बदलता है। घड़ीके लोलककी तरह वे इधर-उधर घूमा करते हैं। जमकर वे बैठ ही नहीं सकते । कोई दौर-दमामवाला आदमी हो और उसने अगर बड़ी बड़ी बातें कर दीं या दावतें दे दीं, तो वे नक्कारचीकी तरह उसीके ढोल पीटने लग जाते हैं। ऐसे लोगोंकी पार्लियामेन्ट भी ऐसी ही होती है। उनमें एक बात ज़रूर है। वह यह कि वे अपने देशको खोयेंगे नहीं। अगर किसीने उस पर बुरी नजर डाली, तो वे उसकी मिट्टी पलीद कर देंगे। लेकिन इससे उस प्रजामें सब गुण आ गये, या उस प्रजाकी नक़ल की जाय, ऐसा नहीं कह सकते। अगर हिन्दुस्तान अंग्रेज प्रजाकी नकल करे तो हिन्दुस्तान पामाल हो जाय, ऐसा मेरा पक्का ख़याल है।

पाठक: अंग्रेज प्रजा ऐसी हो गई है, इसके आप क्या कारण मानते हैं?

संपादक: इसमें अंग्रेजोंका कोई खास क़सूर नहीं है, पर उनकी-बल्कि यूरोपकी-आजकलकी सभ्यताका क़सूर है। वह सभ्यता नुकसानदेह है और उससे यूरोपकी प्रजा पामाल होती जा रही है।

  1. बेईमान।
  2. ईमानदार।