पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२०३

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शब्दार्थ-रुसणां=रूठना । सरावगी=जैन साधु ।

  पंडित सेती कहि रहूया,भीतरि भेध नाहिं ।
  श्रोरूँ कौ परमोधतां,गया मुहरकां मांहिं ॥१३॥
स्रन्दर्भ-- पं डत दूमरो को तो उपदेश देते हैं किन्तु स्वयं उस पर आचरण नहीं करते हैं।  
 भावार्थ--कबीरदास जी पंडित को कह रहे हैं कि तू ऊपर से ढोग दिखाकर ज्ञानी और भक्त्ति बन रहा है किन्तु भक्त्ति अन्त:कण मे व्याप्त नही होती है और दूसरों को तो ज्ञान और भक्त्ति का प्रवोघ, उपदेश देता रेहता है किन्तु स्वय घोर पाप करता रहता है ।
 शब्दार्थ-पर वोधतां= उपदेश करता रहा । मुहरका= च्रधस्थान ।
   चतुरई सूबै पढी, सोई पंजर मांहि ।
   फिरि प्रमोधै श्रांन कौ, श्रापण समभौं नाहिं ॥१४॥
स्रन्दर्भ-- तोते के उदाहरण के द्वारा कबीरदास जी समझाते हैं कि जीव को राम नाम का महत्व समझना चाहिए ।
 भावार्थ--सम्पूणं चतुराई सीख लेने के कारण तोते को लोग पिंजडे मे बन्द कर देते हैं किन्तु स्वयं पिंजडे मे बन्द होकर भी वह और लोगो को उपदेश देता है कि राम का उच्चारण करो यध्यपि वह स्वयं राम के महत्व को समझ नही पाता है ।
 शब्दार्थ-पंजर= पिंजडा । प्रमोधे= उपदेश देना ।
   रासि पराई राषताँ,खाया घर का खेत ।
   श्रौरों कौं प्रमोधताँ,मुख मैं पडिया रेत ॥१५॥
स्रन्दर्भ--ऐसे पंडितो के प्रति संकेत हैं जो दूसरो को तो उपदेश देते रहते हैं किन्तु स्वयं विषय-वासना ग्रस्त रहते हैं ।
 भावार्थ--कुछ किसान अपने खेतो के अनाज की रक्षा न करके थोडा अन्न पाने के लिए दूसरो के खेत की रक्षा करते हैं उसी प्रकार ढोगी पंडित दूसरो को ही उपदेश देते रहते है स्वयं तो विषय-वासना मे पडकर अपना जीवन नष्ट करते रहते हैं ।
 शब्दार्थ-रासि= अन्न का ढेर ।
   तारा मंडल वैसि करि,चंद बडाई खाइ ।
   उदै भया जब सूर का,स्यूँ तारां छिपि जाइ ॥१६॥