पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२२१

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२१० कबीर की साखी

सेप स्बूरी बाहिरा, क्या हज काबै जाइ | जिनकी दिल स्याबति नहीं, तिनकौ कहाँ खुदाइ ||११|| सन्दर्भ-ईशवर प्रप्ती के लिए भ्रम संशय का त्याग आवश्यक हैं| भावार्थ-कबीरदास जी कहते हैं कि हे शेख ! तू सतोष से परे हैं फिर तेरे हज और कावे जाने से कोई लाभ नहीं हैं जिनका ह्र्दय सच्चा नहीं हैं उन्हे ईशवर कही भी प्राप्त होता हैं | शब्दार्थ-सबूरी=सव्र, संतोष| स्यावति=पूएं, स्च्चा|

खूब खाँड हैं खीचड़ी, माँहि पड़ै टुक लूऍ | पेड़ा रोटी खाइ करि, गला कटावै कौए||१२|| सन्दर्भ-मरएपरान्त दणड से बचने के लिए सादा जीवन ०यतीत करना श्रेयष्कर है। भावार्थ-यदि खिचड़ी मे थोडा सा नमक पड जाय तो वही खाँड के समान मघुर हो जाती हैं| पेडा ओर रोटी खा करके भी मृत्यु के उपरान्त अपना गला मौन कटावे? कप्ट कौन सहन करे? शब्दार्थ-टुक=थोडा सा| लूऍ=नमक|

पापी पूजा बैसि करि, भषै माँस मद दोइ| तिनकी दृष्या मुकति नहिं, कोटि नरक फल होइ||१३|| सनदर्भ-घमं के नाम पर जीव हिंसा करने वालो को मुक्ति नहीं मिलती हैं| भावार्थ-पापी लोग पूजा के नाम पर बैठकर मास ओर मदिरा का सेवन करते है ऐसे पापियो की इस दशा पर उन्हे मुक्ति नहिं मिल पाती हैं उनको तो करोड़ो नरको का फल भोगना पडता हैं| यातनायें सहन करनी पडती हैं| शब्दार्थ-वैसीकरि=बैठकर| दष्या=दशा, मुकति=मुक्ति मोक्ष| सकल वरए इकत्र हैं, सकति पूजि मिलि खाँहिं| हरि दासनि की भ्रॅंति करि, केवल जमपुर जाँहिं||१४|| सन्दर्भ-शक्तो के जीव हिंसा के प्रति विरोध प्रदर्शित है| भावार्थ-शाक्ति मम्प्रदाय को मानने वाले सभी लोग एकत्र होकर बलि चढाकर शाक्ति की पूजा करते हैं ओर फिर सभी मिलकर प्रसाद के रुप मे उसका भक्षण करते हैं वे केवल ईश्वर-भक्ति बनने के भ्रम मे पडे रहते हैं वासविकता तो यह कि वे लोघे यमलोक जाते हैं| शब्दार्थ-सकति=शक्ति|