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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/२७

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दोनों का एक ही कथन है कि मानव का भला और बुरा होना उसके कुल या जाति पर निर्भर नहीं है। कुलीनता और अभिजात्य का गर्व झूठा है। जिसके कुल में गोवध होता था, लोग बाह्मआडम्बरों में लीन थे, उसी कबीर ने ऐसा आचरण किया कि तीन लोक नौ खंड में प्रसिद्ध हो गया। इन पंक्तियों से कबीर का बिद्रोहात्मक आचरण प्रकट होता है। पीर शहीद, शेख के गुलाम, ईद बकरीद में ब्रह्म का रूप देखने वाले परिवार में उत्पन्न होकर कबीर ने भिन्न आचरण किया। इसके अतिरिक्त पीपा ने अनेक स्थलों पर कबीर की बड़ी प्रशंसा की है। उनकी वाणी का एक पद उध्दुत किया जाता हैं:—

जो कलिमांझ कबीर न होते।
तौ लै-वेद अरु कलिजुग मिलिकरि भगति रसातलि देते॥
अगम निगम की कहि काहै पाउँ फला भामोत लगाया।
राजस तामस स्वावक कथिकथि इनही जगत भुलाया॥
सागुन कथिकथि मिला पनाया काया रोग बढ़ाया।
निरगुन नीक पियौ नहीं गुरुमुप तातै हाटै जीव निराया॥
बहता स्त्रोता दोऊ भूले दुनियां सबै भुलाई।
कलि विर्द्धकी छाया बैठा क्यूँ न कलपना जाई॥
अंध लुकटिया गहि जु अंध परत कूप थित थोरै।
अबरन बरन दोऊ से अंजन आपि सबन की कोरै॥
लसे पतित कहा कहि रहेते थे कौन प्रतित मन घरते।
नांनां बानी देवि सुनि स्त्रवन बहौ मारग अणसरते॥
त्रिगुण रहत भगति भगवंत कीतिरि, विरला कोई पावै।
दया होइ जोई कृपानिधान की तौ नाम कबीरा गावै॥
हरि हरि भगति भगत कवलीन त्रिविधि रहत थित मोहै।
पाखंड रुप भेष सब कंकर ग्यान सुपले सोहै॥
भगाति प्रताप राण्य बेकारन निज जन-जन आप पठाया।
नाम कबीर साम साम पर करिया तहां पीपै कछु पाया॥

भारतवर्ष में धर्म के नाम पर कौन से अनाचार और दुराचार नहीं हुए। कबीर के समय तक धर्म का स्वच्छ सहज रुप अत्यन्त विकृत और विस्मृत हो गया