कि पाचो तत्वो (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) ने इस विवाह मण्डल की रचना की थी और तीनो गुणो ने मिलकर इसकी लगन लिखी अर्थात् गुणो की अभिव्यक्ति के साथ ही द्वैत भाव उत्पन्न होगया और मेरा प्रियतम का सम्बन्ध अव्यक्त से व्यक्त होगया। वासना और आशा रूपी सखियो ने मगल गान किया—मेरे ससारी बनने पर वासना और आशा को अपनी अभिव्यक्ति का अवसर प्राप्त होगया—इससे वे आनन्दित हो उठी। उन्होने ही सुख-दुःख रूपी हल्दो जीवात्मा के शरीर पर चढा दी और उसको ससार में प्रवृत्त होने के लिए सब तरह तैय्यार कर दिया। अनेक प्रकार के राग-रग ही इस विवाह के भाँवर है। सचित-कर्म रूपी बाबा ने ईश्वर-रूप पति की प्राप्ति के लिए गठ बधन कर दिया अर्थात् यह जन्म दिया। परन्तु पति के वास्तविक सहवास के बिना ही जीवन-रूप सम्पूर्ण सुहाग व्यतीत होगया। चौक पर बैठते ही अर्थात् विवाह के होते ही मैंने काम रूपी सगे भाई को पति रूप में बरण कर लिया। अज्ञानी जीवात्मा ने ईश्वर-रूप अपने पति के वास्तविक दर्शन कभी नहीं किए। पर सच्ची भक्ति न होने पर भी अन्य साधनाओ में फँसी हुई जीवात्मा अपने आपको सती मानने का दम्भ करती रही। जीवात्मा कहती है कि अब मुझे बोध होगया है। कि अब मैं चिता रचकर मरूँगी और पति को साथ लेकर तुरही बजाती हुई भवसागर के पार हो जाऊँगी।
- अलंकार—(i) उपम-सुपने की नाई।
- (ii) रूपक—सुख-दुख हलदि।
- (iii) साग रूपक—पच जना—नाई।
विशेष—(i) सासरे पीव, पच जना इत्यादि प्रतीको का सफल प्रयोग है।
(ii) सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का मिश्रण ही जीवन-सृष्टि है। यही लगन लिखना है।
(iii) जीवन में व्यष्टि जीव बारम्बार अपने शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित होता रहता है। उस समय उसे आनन्द की अनुभूति होती है। दो वृत्तियो की सधियो में जीव अपने शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित होने से आनन्द का अनुभव करता है। जीव और ईश्वर का यह मिलन ही विवाह है और यही जीवन है। जीवन में यह आनन्द इन्द्रियो के माध्यम से प्राप्त होता है। यही मण्डल-निर्भाव है।
(iv) ससार में आते हो जीव माया द्वारा आवृत्त होकर ब्रह्म से विलग हो जाता है। यही जीवात्मा का विधवा हो जाना है।
(v) जीव-भाव के साथ ही माया के कारण जीवात्मा मोह और अज्ञान में फस जाती है। इसी से वह जीवात्मा का भाई है।
(vi) इस पद में ज्ञान और प्रेम की अग्नि में अपने अज्ञान को भस्म करना ही चिता रचकर मरना है तथा ईश्वर के साथ प्रणय एव तन्मयता के अनुभव को तुरी बजाकर कत के साथ तिरनों कहा गया है। सती होने के कारण ही वह स्वय