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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/५०६

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ग्रन्थावली]
[८२१
 

जहाँ जहाँ जाइ तहां सच पावै, माया ताहि न झोलै।
बारंबार बरजि विषिया तै, लै नर जौ मन तौल॥
ऐसी जे उपजै या जीय कै, कुटिल गांठ सब खोलै।
कहै कबीर जब मन परचौ भयौ, रहै रांम कै बोलै॥

शब्दार्थ—डोलै=विचलित हो। सच=सुख। झोलै=जलाती है। सताती है। तोलै=सयमित करता है। रहै=आचरण करता है। बोलै=आदेशानुसार।

सन्दर्भ—कबीर कहते हैं कि सच्चा भक्त वही है जो राम के आदेशानुसार आचरण करे।

भावार्थ—जिसका हृदय भगवान के चरणो मे लगा हुआ है, उसका मन चचल नही होता है। उसे तो आठ सिद्धियाँ और नवो निधियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं और वह व्यक्ति हर्षित हो-हो कर प्रभु का गुणगान करता है। वह जहाँ भी जाता है। वहाँ अमित सुख-शाति का लाभ प्राप्त करता है। माया उसको सता नही पाती है। जिस व्यक्ति के हृदय मे ऐसी श्रद्धा-भक्ति उत्पन्न हो जाती है कि वह विषयों से अपने मन को बारम्बार विमुख करके जो अपने मन को नियत्रित करके प्रभु भक्ति मे लगा देता है, वह माया जन्य समस्त जटिल गुत्थियो को सहज ही सुलझाने में समर्थ होता है। कबीर कहते हैं कि जब इस प्रभु-प्रेम से मन का परिचय हो जाता है, तब वह राम के आदेशानुसार ही आचरण करता है।

अलंकार—(i) पुनरुक्ति प्रकाश—जहाँ जहाँ।
(ii) अनुप्रास—बारबार बरजि विषया।

विशेष—(i) ससार से विमुख होकर प्रभु के नाम पर समस्त कार्य करना, स्वार्थ त्याग कर पारमार्थिक व्यवहार करना ही राम के आदेशानुसार आचरण करना है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी 'विनय पत्रिका' मे कहा है कि—


तुम अपनायो तब जानिहो जब मन फिरि परिहै।
जेहि स्वभाव विषयनि लग्यो तेहि सहज नाथ सों नेह छाँड़ि छल करि है।

(ii) आठ सिद्धि, नव निधि—देखें टिप्पणी पद स॰ १२३।

(iii) जब भक्त का मन पूर्णत सयमित हो जाता है तभी भक्ति एव प्रेम दृढ होते है। सच्चे भक्त का यही लक्षण है।

(iv) कबीर के राम दशरथि सगुण राम नही है। निराकार निर्गुण ब्रह्म हैं। वह पुकार कर कह चुके हैं—

दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना। राम-नाम का मरम न जाना।

(३७३)

जंगल मै का सोवनां, औघट है घाटा॥
स्यंघ बाघ गज प्रजलै, अरु लबी बाटा॥ टेक॥
निस बासुरि पेड़ा पड़ै, जमदांनी लुटै।
सूर धीर साचै मतै, सोई जन छूटै॥