पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६१

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                            (५०)

यदि कहा जाय कि कबीर इस दिशा मे सिद्धहस्त थे | उनके व्यंग बडे मार्मिक और प्रभावशाली होते हैं | उदाहणार्थ यहाँ तीन साखियाँ दी जाती है-

                           (१)
               पण्डित केरी पोथिया ज्यों तीतर का ज्ञान |
              ओरन सगुन बतावही आपन फन्द न जान ||
                           (२)
               पण्डित और मसालयी दोनों सूक्भै नाहिं |
               औरन को करै चॉदन आप अघेरे माहिं ||
                           (३)
               नारी की क्भाईं परत अन्धा होत भुजंग |
               कबीर तिनकी कौन गति नित ही नारी संग ||
          संक्षेप में कबीर अप्रस्तुत योजना सरल प्रभावशाली एवं कृत्रिमता विहिन है |
       संसार की असारता, विषम रीति-नीति, स्वार्थीघता, निम्न प्रवृत्तियो और कटु अनुभवों ने कबीर मे विचित्र तीखापन तथा आलोचनात्मक प्रवृत्ति समुत्पन्न कर दी थी | इसीलिये उनकी साखियो मे अनुभूति की गहनता दिखाई देती है | संसार की गति देखकर उनमे प्रतिकार की ऐसी भावना जाग्रत हो उठी थी कि वे नीति विपयक उक्तियो के द्वारा जनता को जाग्रत् करने के लिए अग्रसर हुए |कबीर के काव्य मे नीति सम्बन्धी अनेक उक्तियाँ मिलती हैं | इनमे एक चतुर व्यक्ति की जैसी दूरदर्शिता एवं एक दूरदर्शी के सहश सुझाव देने को अद्भुत क्षमा थी | उदाहणार्थ यहाँ कतिपय साखियाँ उध्द्रुत की जाती है:-
                         (१)
                देह धरे का दण्ड है, सब काहू को होय |
                ज्ञानी भुगनै ज्ञान से, मूरख भुगतै रोय ||
                         (२)
                जुआ चोरी मुखबिरी, व्याज घूस, पर नार |
                जो चाहे दीदार को एती वस्तु निबार ||
                         (३)
                जग में बैगे  कोठ नहीं, जो मन सीतल होय |
                यह आपा तू डारि दे, दया करै सब कोय ||