पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/६२

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                              ( ४ )
                   मारग चलते जो गिरै, ताको नाई दोस ।
                   कह कबीर बैठा रहै, ता सिर करड़े कोस  ।।
                              ( ५ )
                   जो तो को कोटा बुवै, ताहि बोव तू फूल । 
                   तोहि फूल को फूल हैं, वाको हैं तिरसूज ।।
                              ( ६ )
                   दुर्बल को न सताइये जाकी मोटी हाय ।
                  बिना जीव की स्वांस से,लौह भस्म होइ जाय।।   
                              ( ७ )
                   जो देखे सो कहै नाहिं, कहं सो देखें नांहि ।
                   सुनै सो खमक्भावै नहीं, रसना छग सरबन काही।।
           
          इन साखियो मे गंभीर ज्ञान और अनुभूति की अभिवयंजननाहुई हैं ।
     प्रस्तुत संक्षिप्त वीवेचन से स्पष्ट हो‌ जाता हैं की यद्यपि काव्य रचना कबीर साध्य या लक्ष्य नहीं था फिर भी महान संदेशो को फिर भी अभीव्यक्ति के लिए उन्हें काव्य को माध्यम बनाना पड़ा। घर्म गुरु होने के साथ-साथ कबीर कवि भी थे । डॉ हजारी प्रसाद व्दिविदी के शब्दों में "भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वरणो के डिक्टेटर थे । जिस बात को उन्होंने जिस रूप में प्रकट करना चाहा, उसे उसी रूप में भाषा में कहलवा लिया -- बन गया तो सोधे-सोधे नहीं तो दोहा देकर। भाषा कुछ कबीर के सामने लाचार सी नज़र आती हैं। उसमे मानो ऐसी हिम्मत ही नही की इस लापरवाह फक्कड़ की किसी फ़रमाईश को नाही कर सके । और पकह कहानी को रूप देकर मनोग्राही बना देने की तो जैसी ताकत कबीर के भाषा में है, यैसी भाषा बहुत कम लेखको में पाई जाती हैं । वारणो के ऐसे बादशाह को साहित्य रमिक काव्यनन्द का अस्वाद कराने वाला समाक्भे, हो उन्हें दोष नही दिया जा सकता है। फिर व्यग करने मे चुटकी लिखने की प्रतिज्ञा नहीं की है तपायि उनकी आष्यात्मिकरस की गगरी से काव्य की कटोरो मे भी कम रम इकट्ठा नही हुवा है।
     हिन्दी माहित्य के हजार वषो के इतिहास मे कबीर जैसा प्यतिम्य सेकर कोई लेखक ही नहीं हुवा। --माठी, फकठाना, समाय और वुए झड फ्टकार कर देने वाले तेज ने कबीर कूओ हिन्दी साहित्य का अदितीय