सन्दर्भ - कबीरदास मानव को चेतावनी देते हुए कहते है कि उसे रामनाम का स्मरण करना चाहिए ।
भावार्थ- री पागल जीवात्मा। दिन प्रतिदिन यह शरीर क्षीण हो रहा है। हे पगली। भगवान राम के प्रति मन को अनुरक्त कर ले। तुम्हारा बचपन तो नष्ट हो ही गया है, जीवन भी चली जाएगी और बुढ़ापा तथा मृत्यु का भय उपस्थित होगे । तुम्हारे बाल सफेद हो गए है, नेत्रों मे कमजोरी के कारण सदैव पानी डब- डबाता रहता हे। हे मूर्ख ! अब भी होश मे आजा। देख, बुढापा तो आप ही धमका है। राम-नाम का उच्चारण करते हुए तु्झ को शर्म क्यो लगती है। प्रत्येक क्षण तेरी आयु कम हो रही है और तेरा शरीर दुर्बल होता चला जा रहा है। लज्जा कहती है कि मे यमराज की दासी हुँ। इसी कारण इसको राम-नाम कहने से पराड्मुख करती रहती हूँ। मेरे एक हाथ मे मुगदर है और दूसरे हाथ मे फदा है। जिससे यमराज को इसे मारकर बाँधकर ले जाने मे विलम्ब लगे)। कबीरदास कहते है कि जिन्होने मन से भी राम-नाम को भुला दिया है, उनका जीवन साव्रथा निरथक हो गया है।
अलंकार- (।) मानवीकरण-लज्जा कह्यौ ।
- (।।) पुनरुक्ति प्रकाश-पल-पल ।
विशेष -(।) व्यंजना यह है कि राम-नाम के स्मरण से मृत्यु पर विजय हो जाती है। (।।) निवैद सचारी भाव की व्यंजना है।
(२४३)
मेरी मेरी करतां जनम गयौ,
जनम गयौ परि हरि न कह्यौ ।। टेक ।।
बारह वरस वालापन खोयौ, वोस वरस कछू तप न कीयौ ।
तीस वरस फै राम न सुमिर्यौ फिरि पछितानाँ विरघ भयौ ।।
सूफं सरवर पाली वंघावै, लुलै खेत हठि बाड़ि करै ।
आयो चोर तुरंग मुनि ले गयौ मोरी राखत मुगध फिरै।।
मोस घरन कर कंपन लोग, नैन नीर उस राल वहै ।
जिन्दा वचन सूघ नही निफसै, तब सुकरित की बात कहै।।
कहे कबीर गुनदरे संतो, घन संच्चो कछु संगि न नयौ ।
आई तलब गोपाल राई की बड़ी मंदीर छाड़ि चल्यौ ।।