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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७६३

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ग्रन्थावली ]
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कूंच मुकांम जोग के घर में कछू एक दिवस खटांनां ।
आसन राखि बिभूति साखि दे, फुनि ले मटी उडांनां ॥
या जोगी की जुगति जु जांनै, सो सतगुरु का चेला ।
कहै कबीर उन गुर की कृपा थे, तिनि सब भरम पछेला ॥

  शब्दार्थ— मिलान मिताने की क्रिया । असवार = जीवात्मा रूपी सवार । फुरमायस अनुनय-विनय, प्रार्थना । करक = सेना, विकारो की सेना । गढ़ = शरीर रूपी किला । झेली झेला = झेलना । बादशाह = साधक जीव । कूच = यात्रा ‌ मुकाम == गन्तव्य स्थान, परम पद । खटाना = कस के काम किया । फुनि फिर । पछेला = पीछे छोड़ दिया । मटी = मटिया, समाधिस्थ चेतना ।

संदर्भ - कबीर परमपद की प्राप्त का निरूपण करते हे ।

भावार्थ -( माया-मोह में फँसा हुआ ) यह जीवन एक कोश का वीहड जंगल है । इसमें न तो कोई परमात्मा से मिलने की क्रिया ही बताता है और न कोई उससे मिल ही पाता है । जीवात्मा रूपी यह घुड़सवार अपनी जीवन-यात्रा मे अकेला ही है । वह संसार रूपी जंगल को पार करने के लिए अनेक साधनाओं मे भटकता है । ( काम, क्रोध, लोभ, मोह एव मत्सर) विकार पूरी सेना एकत्र करके जीव को शरीर रूपी गढ़ मे ही घेर लेते हैं । गढ़ मे आबद्ध जीव का धर्म ही अनेक कष्टों को झेलना है । परन्तु साधक जीव रूप राजा अपनी साधना रूपी सेना का संचय करके उस शरीर रूपी किले के घेरे को तोड़कर बाहर आ जाता है अर्थात् देहाव्यास एव विषयासक्ति को छोड़ देता है । इस प्रकार वह जीवन के इस संघर्ष को खेल के रूप खेलकर अपने गन्तव्य परमपव की ओर प्रस्थान कर देता है । इस यात्रा में वह कायायोग में निवास करता है और कायायोग की साधना मे उसको कुछ समय तक कठिन श्रम करना पड़ता है । उसके वाद अपने आसन पर शरीर की मिट्टी को साक्षी रूप छोड़कर वह अपनी समाधिस्थ चेतना को लेकर चला जाता है । जो इस प्रकार के योग करने वाले साधक की साधना को समझता है, वही सद्गुरु का सच्चा शिष्य है अर्थात् सद्गुरु की कृपा प्राप्त करके ही यह साधना की जा सकती है । कबीर कहते हैं कि उसी गुरु की कृपा से योगी साधक सम्पूर्ण भ्रमों को पीछे छोड़ कर परम पद को प्राप्त करता है ।

अलकार—(।)रूपकातिशयोक्ति - पूरा पद ।

(।।) छेकानुप्रास — मिलाननि मेला, असवार अकेला, झेली झेला, खेलि खेला। जोगी, जुगति ।

विशेष—(।) जीवन-संग्राम का सुन्दर रूपक है । इस पद मे पारमार्थिक जीवन क्रम का उल्लेख है ।

(।।) कायायोग साधा न होकर साधन मात्र ही है ।

(।।।) गुरु की महिमा व्यंजित है ।