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पृष्ठ:Kabir Granthavali.pdf/७७८

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[ कबीर
 

 

(।।) विरोधाभास -- करणी तें कारण का मिटना, करणी तें कारण का दास । उपजी च्यत — गई । ससिहर - गहै ।
(।।।) विषय - पावक माहि पुहुप प्रकास, पुहुप माहि पावक प्रज रै ।
(iv) वृत्यानुप्रास - करणी क्रिया करम, पावक पुहुप प्रकास । पुहुप पावक प्रजरे पाप पुन्य, भौ भ्रम, भागा ।
(v) रूपक - वास - वासना, भौ भ्रम ।
(v।) श्लेष - आद्यन्त
(v।।) यमक - कुल कुल, च्यत च्यत
(v।।।) भेदकातिशयोक्ति की व्यजना-ऐसी भई ।

विशेष - (।) इस पद मे उलट बासी शैली की प्रतीकात्मकता दर्शनीय है ।

(।।) प्रतीकों के माध्यम से परम तत्व की अनुभूति दशा की सुन्दर व्यंजना है ।

(।।।) इस पद मे कायायोग की साधना का सुन्दर वर्णन है ।

(।v) चक्र - देखे टिप्पणी पद संख्या ४, २१०

विकास देखे टिप्पणी पद संख्या ४ ।
उलट बासी - देखे टिप्पणी पद स ८०

शून्य गगन तथा निरजन -देखे टिप्पणी पद स १६४ । चितामणि- देखें पद स० १२३ । समभाव के लिए यह पद दृष्टव्य है

अबलों नसानी, अब न नसंहौं ।
राम कृपा भव-निसा सिरानी, जागे पुनि न डसैहौं ।
पायो नाम चारुचितामनि, उर कर तें न खसैहों ।
स्यामरूप सुचि रुचिर कसौटी, त्रित कंचनहि कसैहौं ।
परवस जानि हँस्यौ इन इन्द्रिन, निज बस हृन हँसेहौं ।
मन मधुकर पन के तुलसी, रघुपति पद - कमल बसेहौं ।

( गोस्वामी तुलसीदास )

(v) इस पद की कई पक्तियो के श्लिष्ट प्रयोग से ज्ञानयोग और कायायोग दोनो का अर्थ निकलता है । परन्तु विशेषता यह है कि दोनो का प्राप्य भ्रम नाश, ज्ञान तथा ईश्वर प्रेम है ।

( ३३० )

है हजूरि क्या दूरि बतावै,
दुर बाँधे सुन्दर पावै ॥ टेक ॥।
सो मुलनां जो मन सू लरै, अह निसि काल चक्र सू भिरे ॥
काल चक्र का मरद मान, तां मुलनां कू सदा सलांम ॥
फाजी सो जो काया विचार, अहनिसि ब्रह्म अगनि प्रजारै ॥